कब जुडोगे कान्हा तुम,मेरे अधूरे फसाने मैं।'s image
Love PoetryPoetry1 min read

कब जुडोगे कान्हा तुम,मेरे अधूरे फसाने मैं।

प्रवीण मुन्तजिरप्रवीण मुन्तजिर September 4, 2021
Share0 Bookmarks 54 Reads0 Likes

कब जुडोगे कान्हा तुम,

मेरे अधूरे फसाने मैं।

तेरे दीद को तरसी कान्हा,

मै तो इस बरसाने मैं।

एक बूंद को प्यासी कान्हा,

अपने इस वीराने मैं ।

बिरहा की अग्नि से,

कब तक ऐसी चलूंगी मैं।

आखिर तुमको आना होगा,

मेरे इस बरसाने मैं।

ऊधो भी नहीं दिखते अब तो,

बृज की तंग गलियों मैं।

जो भेज सकती कान्हा,

तुमको प्रेम-पाती मैं।

क्या हाल है मोहन बृजभान की लली का,

पूछो तो बतलाऊ मैं ।

मेरे बिना तुम आधे हो,

तुम्हारे बिना आधी मैं ।


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts