मैं खड़ी बाजार's image
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मैं खड़ी बाजार,
राह, गली, चौराह पर
मंदिर, मस्जिद, गिरजा दर
तन मन वसन मलिन 
रुग्ण, जीर्ण, शीर्ण 
झुकी बुझी शुष्क आँखें,
बुझे तन मन से,
आते जाते गुजरने वाली
हर तीक्ष्ण नजरों से,
करूणा की आस लगाती,
हाँ, मैं खड़ी बाजार।

मैं खड़ी बाजार,
बीच शहर की रौनक पर,
पब, बार, सराय अंदर
सज संवर मुस्काती
मय भरी प्याले की अधर,
चमकती मदमाती नयनों से,
आसीन, आने-जाने वाले 
हर नजरीश की,
आँखों की शोभा बन,
नव-जीवन की संचार भरती,
मैं बनी बाजार की शोभा।

प्रेमवती मुस्काती,
नयन अचकाती,
प्रेमपाश की फांस डालती,
मैं नयनाभिरामी बनी,
हर कामिनी नजरों से कुचलाती,
छद्म प्रेम की धारा में
बहती और बहाती,
दाम-दामन से बंधी दामिनि,
आँखों में चमक लिए,
हृदय में तूफान भरे,
हाँ, मैं खड़ी बाजार।

हर दिन हर पल 
अत्र-तत्र, सर्वत्र
कहीं कोख में मारी,
कहीं तानों से मैं हारी,
कभी हाथों की कठपुतली हो, 
एक विषयवस्तु बनी
भोगवाद की चोट खाती
वाक चुटीले, टीस मारती
खून की आँसू बहाती
कामातुर नजरों से गुजरती
बेबस तन की बोझ ली,
मैं खड़ी बाजार।

लपटीली उलझी राहों में पड़ी,
जिसका न मंजिल न ठिकाना,
समय के जाल में उलझी,
नित जीती और मरती
एक अबुझ पहेली सी,
पहेलियों में बनी एक पहेली,
रात और दिन की भेद बनी,
अंधी गलियों में भगजोगन सी,
चमकती-बुझती,
हाँ, मैं खड़ी बाजार।

© हेमंत श्रीवास्तव प्रणव

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