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चढ़ी नहीं मैं शिखर ,

पर नहीं हूं मैं सिफर,

बुद्धिमान खुद को कहती नहीं,

मूर्खों की कतार में खड़ी नहीं।

मूक मैं हो गयी ,

बोलने के लिए मन मचल गया।

प्रसिद्धि का ख्वाब नहीं,

गुमनामी बर्दाश्त नहीं।

जुगनू सी चमक रही,

चमक रही, फिर खो गयी।

चांद सी बदल रही ,

फैल रही ,सिकुड़ रही।

अपना दिन भी रात है,

रात की क्या बात है।

अपना कोई ढूंढ रही,

वार्तालाप फिर खास हो।

दूरियों का समुंदर बड़ा,

किनारे पर मैं खड़ी,

दूसरा किनारा ढूंढ रही,

अपना सा जो लगे,

सपनों को आकार मिले।

पर दूर ही खड़ा ,

वह मुझे निहार रहा।

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