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"वो रफ़्ता रफ़्ता वृक्ष हो के दूर हो गया"

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल June 13, 2022
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"विकास के हाथों मनुज मजबूर हो गया"



अंकुर लगाया और फिर खुशियों से सजाया

वो रफ़्ता रफ़्ता वृक्ष हो के दूर हो गया,


स्नेह का, वात्सल्य का, मृदु नोंक-झोंक का

मधुवन सा घर,  मकां बना बेनूर हो गया।


दो गज का फ़ासला हुआ मीलों की दूरियाँ

विकास के हाथों मनुज मजबूर हो गया।


-प्रदीप सेठ सलिल

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