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उसके ही घर की बिगड़ती जा रही माटी जनाब

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल January 1, 2022
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रोशनी बोई उजाले की फ़सल काटी जनाब


रोशनी बोई उजाले की फसल काटी जनाब,

लूट ली अंधों ने मिलकर और फिर बांटी जनाब।


उम्र जिस बाड़ी में खेली गुड्डे गुड़िया का विवाह,

उस परी नगरी में शामिल भैंस और लाठी जवाब।


जिसने 'गारे में महल होता है' बतलाया हमें,

उसके ही घर की बिगड़ती जा रही माटी जनाब,


एक पर्वत काटकर  वादी बनायी  प्यार की ,

हर तरफ ज्वालामुखी से भर गई घाटी जनाब।


सदियों दीवारों पे टांके  सभ्यता ने कायदे ,

कागज़ी घोड़ों को दी जाती है क्यों काठी जनाब।

--प्रदीप सेठ सलिल

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