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'सुना है रोशनी की जंग अंंधियारे से लाज़िम है'

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल October 23, 2022
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"दिवाली रोशनी लाई अंधेरे की मुंडेरों से"



दिवाली रोशनी लाई  अंधेरे की मुंडेरों से,

किसी छोटू किसी रामू के कच्चे घर बसेरों से।


के बिजली टूट के गिरती किसी छप्पर के सपने पर,

किसी की आँख में खुशियाँ किसी के थकते पैरों से।


ये मिट्टी के दिए  उसके खिलौने  फूल कागज़ के,

वो कमसिन बेचता नुक्कड़ पे दादी संग पहरों से।


सुना है रोशनी की जंग अंधियारे से लाज़िम है,

भला फिर क्यूँ ये टाटों का शहर पलता अंधेरों से।


मुबारक शम्मा का जलना गली कूंचे ओ देहरी पे,

नुमां हो रोशनी सुख की ख़ुदाया सबके चेहरों से।


--प्रदीप सेठ सलिल

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