*विचारों की चादर*'s image
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बुना मैंने फिर से आज
अपने विचारों की एक चादर
अतीत के रुई की मलमल से
मन के धागों को खींच खींचकर
स्वप्न में देखे हुए कशीदे उभरते रहे
जीवन्त भावनाओं की बिसात पर
सरकता हुआ हर एक धागा
फँसता रहा उलझनों के बीच
अब तलक कुछ कमी है फिर भी
शायद जल्द ही इसकी कसर होगी पूरी
उम्मीद पर टिका है आसमान
और चादर की काया कर रही हैं प्रतिक्षा
अपने पूरे होने की उम्मीद लिए ।।

स्वरचित
   *प्रभु*


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