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क्यों करूँ मैं इश्क़ तू समझा मुझे
इश्क़ से आख़िर मिला है क्या मुझे

जब सदा कोई नहीं सुनता मिरी
चीखकर भी शोर क्या करना मुझे

गाँव से मैं आ गया तेरे नगर
तू मगर मिलने नहीं आया मुझे

दर्द चेहरे पे लबों पे ख़ामुशी
उसकी आँखों में दिखा दरिया मुझे

ज़ख्म देखो देखकर फिर जाओ तुम
ये न पूछो दर्द है कितना मुझे

शक़्ल सूरत तो तिरे जैसी नहीं
पर मिरा चहरा लगा अच्छा मुझे

©प्रभाकर "प्रभू"

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