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दुआएं बहुत की न हासिल हुए तुम,
माना था ईश्वर न काबिल हुए तुम

घरौंदे का जज्बा बनाया था मिल कर,
बहती है कश्ती ना साहिल हुए तुम

सोचा दरखतो पे सावन रहेगा,
जर्द है राहें न बादल हुए तुम

अचानक है उठती अल्फाजों की सिसकी,
लफ्जों में मेरे ना शामिल हुए तुम

पल पल की यादें इक्कठी है ऐसे,
क्यूं नजरों से मेरे न ओझल हुए तुम

तम्मानाओ की गठरी झुकाती है अब भी,
शदाबो में मेरे न शामिल हुए तुम

कहर सा गुजरता है वक्त का पहिया,
हक़ीक़त में मेरी न शामिल हुए तुम

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