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अब राहतें मयस्सर कैसे हो जनाब
भला कौन सुलझाए उलझे स्वालो के जवाब,
जो रूठे खुद से तो कौन ही मनाए,
जो बरसे आंसू तो कौन ही हटाए

अब तो उलझना,सुलझना, हंसना,रोना खुद से ही है,
उम्मीदों के दायरे  समेट लेने में ही फायदा है,
अमूमन इस जहां में गिरने पर उठाने वाले मिल जाते है,
पर हाथ थाम चलने वाले विरले ही मिल पाते है

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