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मैं और मैं
ये मेरे दो पहलू हैं

एक जो इस कोटर से बाहर
उड़ता है, घूमता है,
एक जो वास्तविक है
और घिरा हुआ है यंत्रों से, 
घिरा हुआ है विज्ञान से
और मूर्खता के ज्ञान से।

मैं अपने दोनों पहलुओं से बातें करता
बातें करता कि तुम ऐसे क्यों हो?
बातें करता कि वह ऐसा क्यों नहीं?

उत्तर सदैव आता
कि तुम ऐसे क्यों हो? वह तो नहीं !

उत्तर आता
कि तुम जब बिना परों के हो
और कोटरे में रहते हो,
तो ऊँची उड़ानों के स्वप्न क्यों देखते हो?

उत्तर आता
कि तुम यदि उड़ना ही चाहते हो,
तो इस कोटर में क्यों रहते हो? 
जब बादलों को छूना चाहते हो,
वृक्षों में क्यों शरण लेते हो?

उत्तर आता
कि यदि गरजना और बरसना चाहते हो,
तो नदियों के साथ क्यों बहते हो?
स्वयं ही सागर क्यों नहीं बन जाते!

मैं निःशब्द, हतप्रभ, वाणीरहित सा 
सोच रहा हूँ 
कि ये सब मेरे किस पहलू ने लिखा!

©Pandit Keshav

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