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तपती दोपहरी हो या हो बारिश मूसलाधार,

तुम नहीं रुकते हे फसलों के सृजनहार।

हे कर्मठ चाहे हो तुम्हारे पैर नग्न,

चाहे फटे वस्त्र से ताक रहें हो थका हुआ तन।

बैलों के संग तुम कोल्हू के बैल,

चीरते चले धरती चाहे हो शैल।


तुम्हारे अथक परिश्रम से, 

पसीने की सिंचन से,

होती इस धरा से पैदावार।

तुम नहीं रुकते फसलों के सृजनहार।

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