जिंदगी लग जाती है घर को घर बनाने में's image
Poetry1 min read

जिंदगी लग जाती है घर को घर बनाने में

Nivedan KumarNivedan Kumar January 5, 2022
Share0 Bookmarks 119 Reads1 Likes


जिंदगी लग जाती है घर को घर बनाने में

वक्त पर लगता नहीं है तोड़ने जलाने में


हकीकत से जब भी वो जरा भी दूर जाता है

कभी देरी नहीं करता मैं उस को आईना दिखाने में


अंधेरा हो,अकेले हों नहीं हो दूर तक कोई

खुद को जलाना पड़ता है तब रोशनी बनाने में


भले दो चार दिन की है मगर यह जिंदगी है जिंदगी

बयां कैसे करें हम जिंदगी को मुख्तसर फसाने में


खुद में लाख कमियां है फिर भी बेफिक्री सी है

मगर मशगूल हैं सब दूसरों की कमियां गिनाने में


हार जीत से अपनी है न खुश न मायूस कोई

सारी दुनिया लगी है पर औरों को हराने में


सच अकेला है बहुत बदनाम है गुमनाम है

झूठ है मशहूर बेहद आजकल जमाने में


हक की रोटियां देते हैं या एहसान करते हैं

मशरूफ हैं सब बस अपनी शोहरत बनाने में


यूं तो हम भी शायरी के हैं बहुत शौकीन मिश्र

लगती है मेहनत बहुत पर काफिया लगाने में


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts