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बात ही कुछ और है।

NIKESH AGRAWALNIKESH AGRAWAL January 16, 2022
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यूं तो ज़िन्दा थे तेरे आने से पहले भी...
पर अब जो ज़िन्दगी जीने में बात ही कुछ और है,
यूं तो सोते थे पहले भी रातो को घोडे बेच कर,
पर अब जो तेरे ख्वाबो की बात ही कुछ और है ।

यूं तो पहले भी पढते थे मुहब्बत के किस्से,
उन किस्सो को जीने में बात ही कुछ और है..
यूं तो गाते थे नगमे हम पहले भी हज़ारो,
अपनी मुहब्बत को गुनगुनाने में बात ही कुछ और है।

सुनी थी हमने भी इश्क़ की बदनामीयां,
पर अब जो हो गया ये सूरत-ए-हाल ही कुछ और है..
लगती है बेईमान वो सारी बदनामीयां,
कहने वालो का इश्क़ के मलाल ही कुछ और है।

यूँ तो न हुँ शायर न हुँ लेखक कोई,
लिखता न जाने कैसे हुँ ये बात ही कुछ और है..
बस गोते ही लगाता हुँ तेरे ख़यालों के समंदर में,
जो पन्ने पे उतर आए तो बात ही कुछ और है।

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