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मानस की जात सबैएकै पहचानबौ (भाग-3)

Neeraj sharmaNeeraj sharma January 2, 2022
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मानस की जात सबैएकै पहचानबौ 
               धर्म-कब,क्यों और कैसे(भाग-3)
                 (नीरज शर्मा-9211017509)              

जारी है.....
                मानव ने समय के साथ चलते हुए अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और इच्छा शक्ति से बहुत से आविष्कार एवं खोजे की।अब मानव आग जला सकता था,खेती करता था, पत्थर के हथियार और औजार बनाता एवं इस्तेमाल करता। मानव अब पशुपालन और जानबरो को काबू कर इस्तेमाल करना सीख चुका था।वो अब अलग-अलग जानवरों का अलग-अलग कार्यों के लिए इस्तेमाल करने लगा। जानवरों के इस्तेमाल ने मानव का जीवन काफी आसान कर दिया था। अब वो दूसरे लोगों के साथ सामान की अदला-बदली करता और अपनी हर जरूरत की पूर्ति करने लगा। इस तरह से मानव जीवन में व्यापार की शुरूआत हुई।अब  वो गुफाओं से निकल स्वनिर्मित मकानों में रहने लगा।मानव की बुद्धि के विकास के साथ उसका रहन-सहन भी ऊंचा उठ रहा था।अब मानवों का समूह जहां रहता।वो हर काम में एक दूसरे का सहयोग और मदद करने लगे।जिस जगह वो रहते वहां की  साफ-सफाई,पय जल की आपूर्ति, गन्दे पानी की निकासी, दूसरे मानव समूहों,सगंठनो और‌ जानवरों के हमलों से सुरक्षा ,कृषी आदि के कामों को सुचारू एंव कुशलतापूर्वक नियंत्रित करने के लिए कार्यपालिका का गठन होने लगा जिनमें से एक मुखिया और कुछ लोगों का समूह इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान रखते,इन समूहों में रहने के नियम, परमपराएं और आचार संहिताए थी।सब को उनका पालन करना होता था। छोटे-छोटे मानव समूहों का एक बड़े समूह में विलय होने लगा।इन बड़े समूहों को कबीला या गांव कहा जाने लगा।आगे चल कर इन गांवों, कबीलों और नगरों के समूहों से अलग-अलग सभ्यताओं ने जन्म लिया। अब तक विश्व में प्राचीनतम सभ्यता सुमेर सभ्यता को माना जाता है पर लगातार चल रही शोध और अलग-अलग जगहों पर चल रही खुदाई में यह अब साफ होने लगा है कि भारतीय संस्कृति व सभ्यता विश्व की प्राचीनतम संस्कृति और सभ्यता है।मध्यप्रदेश के भीमबेटका में पाए गए 25 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा मेहरगढ़ के अलावा कुछ पुरातत्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत की भूमि आदिमानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। यहीं से मानव सभ्यता विश्व के अलग-अलग स्थानों पर जा कर बसी। प्रत्येक सभ्यता की खोज में कि गई शोधो और खुदाईयों में मिली मूर्तियों से यह बात स्पष्ट हो गई है कि इन सभ्यताओं में वैदिक धर्म की ही मान्यता थी।अब तक विश्व में भिन्न-भिन्न समय पर  340 से 350 धर्मों का उदय हुआ है। जिनमें से आज कुछ धर्म ही बचें है।बहुगिनती में धर्म पूर्णता विलुप्त हो गए या कुछ विलुप्तता के कगार पर हैं। बहुत सिमित गिनती में धर्म हैं जो उन्नति और प्रगति कर रहे हैं। विश्व में समय समय पर अलग अलग धर्मो का जन्म हुआ।मेरी यह कोशिश रहेगी कि ज्यादा से ज्यादा धर्मो की जानकारी इस लेख श्रृंखला द्वारा आप तक पहुंचाने की। मुख्यता हम इन धर्मों का आरंभिक काल, किसने आरंभ किया,किस की उपासना करते हैं,उनके मुख्य किरदारों की संक्षेप में जीवन यात्रा,उन धर्मो की शिक्षाएं और उनके पवित्र ग्रंथ, मुख्य त्योहार,जनसंख्या आदि पर प्राचीनतम से नवीनतम के क्रम में चर्चा करेंगे। 

सनातन धर्म
      ‌ सनातन का अर्थ होता है शाश्र्वत यानि हमेशा बना रहने वाला अर्थात जिसका आदि और अन्त ना हो।सनातन धर्म को विश्व में प्राचीनतम धर्म होने का गौरव प्राप्त है। विश्व के ज्यादातर प्रमुख पुरातत्व विशेषज्ञों, विद्वानों और इतिहास पण्डितो के अनुसार एक समय पृथ्वी पर ऐसा था जब सनातन धर्म पूरे विश्व में फैला हुआ था।आज सनातनधर्म अनुयायि बहुसंख्या में मुख्यता भारत, नेपाल,श्रीलंका,भूटान,फिजी,मोरिशियश, दक्षिणी अमेरिकन, मध्य पूर्वी एशिया के देशों में बसे हुए हैं।सनातन धर्म को एक लेख श्रृंखला या एक किताब में वर्णित कर पाना असम्भव है।सनातन धर्म साहित्य, संस्कृति,मान्यताओ, महान ग्रन्थो का अति विशाल महासागर है और यह लेख माला उस महासागर की एक बूंद के कण के सहस्त्र भाग के बराबर भी नहीं है। इसलिए यहां उन्हीं बातों की संक्षेप में चर्चा करेंगें जो अति आवश्यक हैं।सनातन धर्म को वैदिक धर्म और हिन्दू धर्म भी कहा जाता है। सनातन धर्म की मूल भावना को समझना चाहते हैं तो इस श्लोक का अर्थ समझ लें।                                             
         “अयं बंधुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्
            उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्”
अर्थात- यह मेरा बंधु है वह मेरा बंधु नहीं है ऐसा विचार या भेदभाव छोटी चेतना वाले व्यक्ति करते हैं। उदार चरित्र के व्यक्ति संपूर्ण विश्व को ही परिवार मानते हैं ।                                               
                            सनातन धर्म में मूर्ति पूजा में दृढ़ मान्यता है।ये अपने अराध्य परमेश्वर को ईश्वर, भगवान, प्रभु,देव,देवी,देवता आदि नामों से पुकारते हैं।यह अपने अराध्य के लिए व्रत और यज्ञ हवन को बहुत ज्यादा अहमियत देते हैं।सनातन धर्म के मानने वाले पुनर्जनम पर बहुत विश्वास करते हैं। इस धर्म में कर्म और कर्म फल में प्रमुखता से विश्वास किया जाता है।इस धर्म मे अराध्य प्रभु की विधिवत ढंग से पूजा अर्चना की जाति है।हवन ,यज्ञ, व्रत और ध्यान साधना को विधीवत रूप से पूर्ण करने को प्रभु के दर्शन और प्रभु को प्रसन्न कर के मन चाहा वर पाने के लिए मुख्य स्रोत माना जाता है।इन में प्राकृति और प्राकृतिक संसाधनों कौ विशेष सम्मान दिया जाता है।कई वृक्षों, नदियों, पर्वतों और पहाड़ों को पूजा जाता है। यहां एक रोचक तथ्य आप लोगो के सामने रखना अनिवार्य समझता हूं वो यह कि साधारणतया हम सब ईश्वर, भगवान और देवता को एक ही या तीनों नामों का अर्थ एक ही मानते है। जब की तीनों के अर्थ अलग अलग हैं।जो कि एकाग्रचित्त होकर सोचने से सामने आ जाते हैं। चलिए देखते हैं।
ईश्वर - ईश्वर मूल‌ वाक्य अनशवर से बना है।अनशवर अर्थात जिस का कभी नाश ना हो यानि उसका कभी अन्त नही होता और ना ही उस का कभी आरम्भ होता अर्थात वो ब्रह्मांड से पहले भी था और ब्रह्मांड के अन्त के बाद भी रहेगा।
भगवान - भगवान‌ शब्द का जब हम संधी विशेद करते है तो सारा रहस्य खुल जाता है।
भ+ग+व+अ+न अर्थात पंच तत्वों से बना- भ=भूमि,ग=गगन,व=वायु,अ=अग्नि,न=नीर अर्थात पांच तत्वों से बना यानि वो मनुष्य की तरह धरती पर अवतरित होता है और अपना कार्य पूर्ण कर ने के पश्चात् इन्हीं पांच तत्वों में ही विलीन‌ हो जाते है। भगवान ईश्वरीय अंश होते हैं और संपूर्ण कला निपुण होते है ।वे हर ईश्वरिय शक्ति का अपनी इच्छा से उपयोग कर सकते हैं।
देवता - देवता मूल शब्द दिव्यता से बना है।देवता आलौकिक शक्तियों के स्वामी होते हैं।अलग अलग देवता ब्रह्मांड की अलग अलग क्रियाओ को व्यवस्थित ढंग से संचालित करते हैं।यह सभी स्वर्ग लोक या देव लोक में निवास करते हैं। इन्द्र देव को देवताओं का राजा माना जाता है।                                             
                    सनातन धर्म में काल खण्ड को चार युगों में विभाजित किया गया है।पहला सतयुग,दूसरा त्रेतायुग तीसरा द्वापरयुग और चौथा कलयुग। कलयुग के अंत में प्रलय आएगी और पृथ्वी का पूर्ण नाश हो जाएगा।कई युगों बाद पृथ्वी पर फिर से वनस्पति,पेड़,पौधे ,जीव, जन्तु , मानव का जन्म होगा और फिर से पहले युग से चौथे युग के अंत की तरफ का सफर शुरू हो जाएगा यानि आदि से अन्त की तरफ युगों का पहिया फिर से घुमने लगेगा।यह अन्तहीन चक्कर निरन्तर जारी था, जारी है और जारी रहेगा। सनातन धर्म को मुख्यता चार मत या सम्प्रदाय में बांटा गया है वैष्णव मत- इनमें मान्यता है की श्री विष्णु ही ईश्वर है सृष्टि का आदि और अन्त वही है। शैव मत- शैव मत के अनुयाई शिव को ईश्वर और सृष्टि का स्वामी मानते हैं।शाक्त मत- इस मत के लोग आदि शक्ति को ईश्वर एवंम ब्रह्माण्ड का स्वामी मानते हैं और स्मार्त मत- स्मार्त मत वाले उपरोक्त्त तीनों को ही ईश्वरीय रूप मानते हैं।उनका विश्वास है कि रूप अनेक परन्तु ईश्वर एक ही है।सनातन धर्म में तीन देवों को सर्वोच्च माना जाता है। श्री ब्रह्मा- ब्रह्मांड रचेता, श्री विष्णु-पालन करता और श्री महेश यानि शिव- संहार  करता। इन्हें त्रिमूर्ति भी कहा जाता है। सनातन धर्म के अनुसार सृष्टि के प्रबंधन को व्यवस्थित एवं संचालन के लिए हर कार्य के लिए अलग-अलग देवता हैं। उदाहरण के तौर पर सूर्य देव, चन्द्र देव,पवन देव, वरूण देव, अग्नि देव आदि।सभी देवताओं ‌के स्वामी इन्द्र देव हैं।इस धर्म में गाय को विशेष स्थान प्राप्त है। गाय को मां का दर्जा दिया जाता है। गाय की सेवा को बहुत ही अच्छा कर्मफल देने वाला माना जाता है।सनातन धर्म समाज में चार वरण या जातियां हैं।ये चार जातियां ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र हैं।   सनातन धर्म में प्रार्थना स्थल को मन्दिर कहा जाता है।  मन्दिर में सभी भगवान और देवी देवताओं की मूर्ति  रूप में या चित्रों के रूप में पूजा अर्चना की जाती है। भगवान शिव को मूर्ति, चित्रों और शिवलिंग रूप में पूजा जाता है। मन्दिर में हर भगवान की मूर्ति या शिवलिंग को वेदिक अनुष्ठान और धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हुए ही स्थापित किया जाता है। मूर्ति स्थापना के साथ ही वेदिक मंत्रों उच्चारण द्वारा मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। प्राणप्रतिष्ठा के बाद मूर्ति को जीवित मान लिया जाता है और उनको प्रत्येक दिवस वो सभी क्रियाएं करवाईं और सभी वस्तुएं उपलब्ध करवाईं जाती है जो कि एक जीवित मनुष्य अपनी प्रत्येक दिनचर्या में उपयोग करता है। मन्दिर के प्रवेशद्वार पर एक घंटी या घंटा लटकाया जाता है।हर प्रवेश करने वाले को यह घंटी या घंटा बजाने के बाद ही मन्दिर के अन्दर प्रवेश करना होता है। यह घंटी या घंटा भक्त के पधारने की सूचना भगवान को देता है। मन्दिर में सनातन धर्म से संबंधित सभी पवित्र ग्रंथ विराजमान रहते हैं। सनातन धर्म में पवित्र ग्रंथों की दो अलग अलग श्रेणियों में बांटा गया है। वो श्रेणीयां हैं श्रुति ग्रन्थ और स्मृति ग्रन्थ।

श्रुति ग्रन्थ -इस श्रेणी में ऋग वेद,साम वेद,यजु वेद और अर्थ वेद।यह उन ग्रंथों की श्रेणी है जिन ग्रन्थों में किसी भी तरह का संशोधन अथवा बदलाव‌ नही हो सकता ना तो किसी भी समय खण्ड के अनुसार और ना ही किसी भी क्षेत्र, राज्य,नगर और देश के अनुसार। श्रुति का मतलब होता है सुनना।इन ग्रंथों में जो कुछ भी लिखा गया है ‌वो स्वयंम भगवान ब्रह्मा जी ने अपने श्री मुख से उन महान ऋषियों के स्वपन में आ कर उनको सुनाया और उन ऋषियों ने वो सारे श्लो युद्धक, स्तुतिया इन  ग्रन्थों में लिखे।इन ग्रन्थों का मूल स्वरूप ब्रह्मी लिपि में लिखे गए थे। ब्रह्मी लिपि की रचना ब्रह्मा जी ने श्रृष्टी की रचना के समय की थी और उन्होंने ने ही ऋषियों को इसका ज्ञान दिया था।पवित्र ग्रंथों में जो कुछ उस समय ऋषि मुनियों ने लिखा आज भी वैसे का वैसा ही है।इनमें ना तो कुछ नया सम्मलित किया जा सकता और ना ही जो लिखा है वो हटाया या बदला जा सकता है।भारत में अकसर जिस किसी बस्तु या व्यक्तव्य को ना बदल सकते हो,उसकी दृढ़ता 'ब्रह्म वाक्य' जैसा कह कर प्रदर्शित करते है और श्रुति ग्रन्थ में तो एक एक शब्द- वाक्य ब्रह्म जी द्वारा ही लिखवाया गया है।आप विश्व के किसी कोने में चले जाइए अगर वहां कोई सा भी श्रुति श्रेणी का ग्रन्थ उपलब्ध है तो आप देखेंगे कि उसमें लिखा एक एक शब्द वही और वहीं विराजमान है जैसा और जहां मूल ग्रन्थ में है।

स्मृति ग्रन्थ- इस श्रेणी में वो पवित्र ग्रंथ आते हैं। जिनमें घटित होने का समय अलग था और लिखे जाने का समय अलग था अर्थात इन ग्रन्थों में जिन घटनाओं का विवरण है उनको काफी समय तक ऋषियों ने स्मृति यानी याद रखा और फिर उन्हें लिखा या अपने शिष्यों से लिखवाया।इस श्रेणी में श्री रामयण,श्रीमत भगवत गीता,पुराण, महाभारत, वशिष्ठ स्मृति,व्यास स्मृति,मनु स्मृति,यम स्मृति, बृहस्पति स्मृति आदि स्मृति ग्रन्थ कहलाते हैं। श्री रामायणजी और श्रीमत भगवत गीता के पवित्र स्वरुप लगभग हर सनातनि के घर आप को मिल जाएंगी।श्री रामायणजी भगवान राम चन्द्र जी के जीवन काल पर आधारित है। इसमें भगवान राम चन्द्र जी जो कि भगवान विष्णु जी के सातवे अवतार थे तथा अयोध्या राज परिवार के युवराज थे और बाद में राजा भी बने उनके जन्म,बालकाल, धर्म की रक्षा हेतु राक्षसों के वध, शौर्य, पिता का वचन निभाने के लिए उनका राज सिंहासन त्याग, वनवास,दम्भी रावण वध, अयोध्या के राजा बनना,राम राज्य, चरित्र चित्रण आदि लिलाओ कि विस्तृत एवंम महान गाथा है।महाभारत भी इनका एक मुख्य और पवित्र ग्रंथ माना जाता है पर महाभारत के साहित्यिक स्वरुप को कोई भी सनातनी अपने घर में नहीं रखता।इस का मुख्य कारण इस में वर्णित वास्तविक युद्ध की कहानी है।इस युद्ध की पृष्ठभूमी जो अपने समय में असल घटित सबसे बड़ा युद्ध था।जो की एक ही राज परिवार के दो भाईयों के पुत्रो, कुटुम्बी जनों, मित्रों एवंम उनकी सेनाओं के बीच लड़ा गया। जिसमें एक राजकुमार पुत्र के मोह में राजा पिता उसकी लालसा,लोभ, द्वेष,षड़यंत्रो,कुकृतियों,अहंकार, दुराचारी आचरण में साथ दे कर अपने सम्पूर्ण वंश का नाश करवा लेता है।इस पूरे ग्रन्थ एक पात्र भगवान श्री कृष्ण भी है।श्री कृष्ण भगवान विष्णु मुख्य अवतारों  में आठवें अवतार थे। भगवान विष्णु के कुल चौबीस अवतार हुए। जिनमें से दस पूर्ण या मुख्यअवतार माने जाते हैं। अगर चौबीस अवतारों में से देखें तो श्री कृष्ण बाईसवें अवतार थे और अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी लोक पर जन्म लिया था। महाभारत युद्ध के आरंभ से  कुछ समय पहले जब दोनों सेनाएं युद्ध लड़ने के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने सामने खड़ी होती हैं तब उनके परम भक्त और मित्र अर्जुन जब शत्रु सेना में अपने गुरु, पितामह, भाईयों, भतीजों, कुटुम्ब जनो, मित्रों, सम्बंधियों को देख कर भावुकता वश अपने शस्त्र नीचे रख देता है और युद्ध करने से मना कर देता है।उस युद्ध में श्री कृष्ण ने शस्त्र ना उठाने का प्रण ले रखा था परन्तु युद्ध में धर्म की जय के लिए वे युद्ध में अर्जुन के सारथी बन के शामिल हुए थे।जब उन्होंने अर्जुन की यह व्यथा देखी तो उन्होंने अर्जुन को कर्म, कर्तव्य, जीवन, आत्मा, जीवन,मरन के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए गीता का महान उपदेश दिया और अपने ब्रह्मांड रूप के दर्शन अर्जुन को करवाऐ। महान गीता के उपदेश श्रीमत भगवत गीता ग्रंथ के रूप में आज भी अपने दि‌व्य आलोकिक प्रकाश से  मानव सभ्यता के धर्म और कर्म के पथ को आज भी प्रकाशित कर रहा है‌।श्रीमत भगवत गीता का स्वरुप भी लगभग हर सनातनि के घर में श्रद्धा पूर्वक विराजमान देख सकते है। सनातन धर्म में स्त्रीयो को विशेष महत्व और स्थान प्राप्त है। आदि शक्ति मां दुर्गा है।सब देवियां आदि शक्ति का ही रूप हैं। इन्हें जगत माता कहा जाता है। वैसे तो सभी देवियों एक रूप की अलग अलग छवि हैं परन्तु माता पार्वती,माता लक्ष्मी और माता सरस्वती को सर्वोच्च माना जाता है।माया का महत्व भी  इस धर्म में बहुत माना गया है।माया मां लक्ष्मी का ही रूप है।मानव के ज्यादातर कर्म माया और मोह की लालसावश ही होते हैं।सनातन धर्म में जीव द्वारा किए कर्मो का बहुत महत्व है। सनातन धर्म में मान्यता है कि भौतिक बस्तुएं, रिश्ते नाते,धन यहां तक की मानव की अपनी देह भी सिर्फ पृथ्वी लोक तक साथ देती है। जैसे ही आत्मा मानव शरीर छोड़ परलोक की तरफ प्रस्थान करता है तो सिर्फ़ उसके अपने जीवन काल में किए कर्म ही साथ रह जाते हैं और उन्हीं कर्मो द्वारा अर्जित किए
 पाप-पुण्य के आधार पर आत्मा को स्वर्ग लोक या नरक लोक मिलने की मान्यता है। आत्मा को मृत्यु के बाद एक शरीर को छोड़ दूसरे शरीर को वस्त्रों की तरह बदलने वाली अजर , अमर, अभिनाशी चेतना माना जाता है। आत्मा मृत्यु के बाद अपने उस जन्म में किए पाप और पुण्य के आधार पर नई योनी में जन्म लेती है। सनातन धर्म में मान्यता है कि मानव जीवन सब जीवों में उत्तम है और आत्मा मृत्यु लोक के जीवन काल के सद्कर्मो को अर्जीत कर चौरासी लाख योनियों को भुगतने के बाद मानव जीवन प्राप्त करता है।मानव जीवन में किए सद्कर्मो के फल स्वरूप उसकी जीव आत्मा मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है।मोक्ष ही वो गंतव्य है जिसे हर मनुष्य पाना चाहता है।मोक्ष प्राप्ति के पश्चात् आत्मा जीवन मरन के चक्कर से मुक्त हो ईश्वर में ही समा जाता है। सनातन धर्म में मान्यता है कि मुनष्य का कर्म ही उसका हर लोक और जन्म में जीवन पथ तह करता है। मुनष्य को कर्मो का फल तो भुगतना ही पडता है। इस लोक में भी, परलोक में भी और अगले जन्म में या फिर उससे भी अगले जन्मों में यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा जब तक की उसके किए कर्मों के बदले में मिले फल समाप्त ना हो जाए। आत्मा को उसके बाद ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। सनातन धर्म का संक्षेप वर्णन को एक लघु कथा के बाद विराम देते हैं।इस लघु कथा से आप को कर्म के फल का महत्व सहजता से समझ आ जाएगा।

लघुकथा-त्रेता युग में घटित यह घटना श्री रामायणजी के किश्किंधा काण्ड में बाली वध की यह महान कथा वर्णित है। जिसमें सुग्रीव की मित्रता के लिए भगवान श्रीराम ने छुप कर बाली का वध किया था।बाली एक महान महाबली था।जिसे देवताओं से यह वर प्राप्त था की जो कोई भी तुम्हारे सामने आ कर युद्ध करेगा उस प्रतिद्वंद्वी की आधी शक्ति उसको छोड़ बाली के बल मे आ कर मिल जाएगी।इस कारण बाली का कोई भी महाभट योद्धा और कोई दिव्य अस्त्र भी कुछ नही बिगाड़ पाता था।अब उसे अपनी शक्ति पर अहंकार हो गया था।वो अब महान योद्धा से आतातायी बन अधर्म के पथ पर चल पड़ा था। धर्म की रक्षा के लिए उसका वध आवश्यक। देवताओं द्वारा दिए वरदान को श्री राम जी निश्चित ही काट सकते थे क्योंकि वह तो स्वयं ही भगवान थे। उनके लिए कुछ भी असम्भव नही था।वो तो स्वयं तीनों लोकों के स्वामी थे। उनके लिए तो बाली वध पेड़ से पता तोड़ने जैसा था परन्तु इससे देवताओं द्वारा दिए वरदान और देवताओं के कथन का किसी की भी नज़रों में कोई मोल ना रह जाता।इस लिए उन्होंने ऐसा करने का निर्णय लिया ।बाली पर प्रभू द्वारा चलया बाण बाली के लगने के बाद जब वो मृत्यु के समीप था तब उसने अपने गुनाहों के लिए श्री राम से क्षमा मांगी और प्रभु के हाथों मिली मृत्यु के लिए धन्यवाद भी किया परन्तु श्री राम के मन में यह ग्लानि हमेशा रही कि बाली जैसा महान योद्धा उसे मिली मृत्यु से अच्छी और सम्मानित मृत्यु का हकदार था।समय निकलता गया। त्रेता युग समाप्त होने वाला था।चारो दिशाओं में धर्म स्थापित हो चुका था। विश्व में चारों ओर शान्ति और समृद्धि का वातावरण था।तब भगवान श्रीराम ने जो कि श्री विष्णु जी के अवतार थे ने पृथ्वी लोक पर अपने किए सभी कर्मों का एक साधारण मनुष्य की फल को पूर्णता भोगने के उपरान्त निर्णय लिया और पृथ्वी लोक छोड वापिस अपने लोक जाने के लिए जल समाधि में जाने का निश्चय किया। वो जब जल समाधि लेने के लिए सरयु नदी की तरफ जा रहे थे तो उन्हें आभास हुआ कि कोई उनका पीछा कर रहा है। उन्होंने पलट के देखा तो उन्हें बाली की आत्मा हाथ जोड़कर दिखी।राम जी को तो पहले ही स्मरण था कि इस जीवन में वो बाली कि मृत्यु का ऋण वो नही उतार सके हैं। उन्होंने बाली की आत्मा को प्रणाम किया और बोले की तुम्हारा ऋण मैं अपने अगले जन्म काल जो कि द्वापरयुग में होगा। द्वापरयुग आया और समय की धारा के साथ बहते बहते अपने आखिरी पड़ाव तक पहुंच गया। द्वापरयुग युग में भगवान विष्णु जी ने भगवान श्री कृष्ण का रूप धरा था।श्री कृष्ण जी अपनी सभी लिलाए पूर्ण कर के और पृथ्वी पर पुनः धर्म की स्थापना कर के फिर से अपने लोक में वापिस जाऐ का निश्चय कर चुके थे।एक दिन श्री कृष्ण जी जंगल में एक वृक्ष के नीचे बैठे बांसुरी बजा रहे थे। बैठे बैठे श्री कृष्ण जी को निंद्रा आ गई।उसी जंगल में उसी समय‌ एक शिकारी आखेट की तलाश में भटक रहा था।उसी समय उसे झाड़ियों के पीछे से मगृ की चमकती आंख का आभास हुआ। उसने तुरंत तीर कमान पर चढ़ा कर पुरी ताकत से खिंच कर छोड़ दिया और तीर सीधा अपने लक्षय पर जा लगा।आखेटक उत्सुकतावश भागता वहां पहुंचा और देखा कि उसने वो तीर लेटे हुए श्री कृष्ण के पैर में धंसा हुआ है।श्री कृष्ण के पांव में बंधी मणि को मृग की आंख समझ लिया था और विष में बुझे बाण से भेद दिया था।अपने अवतार रूप के अंतिम क्षणों में पहुंच चुके श्री कृष्ण ने आंखें खोली तो आखेटक उनके समीप हाथ जोड़े खड़ा पश्चाताप में आंसू बहा रहा था।श्री कृष्ण ने उसे अपने समीप बैठा कर चुप करवाया और उसे बाली वध की कथा सुनाई।श्री कृष्ण बोले की द्वापरयुग में तुम ही बाली थे और मैं राम था। तुम्हारा वध इसी तरह मैंने छुप कर किया था ।तुम्हारे वध का ऋण आज तक मेरे उपर था परन्तु मेरे उस कर्म का फल मुझे आज मिला है और आज मैंने अपने जीवन काल के सभी कर्मों के फल भुगत लिए है। यह कहने पश्चात् श्री कृष्ण जी चिर निंद्रा में समां गए। इस कथा से हमें कर्म और उसके फल का महत्व का पता चलता है।
कुल जनसंख्या-लगभग1,127,654,642
प्रतीक चिन्ह-

प्रमुख त्यौहार- होली, दिपावली, महाशिवरात्रि, नवरात्र, दुर्गा पूजाविजयदशमी,रामनौंवी, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी आदि
                                                        ..... क्रमश

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