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मानस की जात सबैएकै पहचानबौ (भाग-2)

Neeraj sharmaNeeraj sharma January 1, 2022
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मानस की जात सबैएकै पहचानबौ 
              धर्म-कब,क्यो और कैसे(भाग-2)
                (नीरज शर्मा-9211017509)       
        

जारी है.....                 
       समय के चक्र के साथ गतिमान मानव सभ्यता उस अवस्था तक आ पहुंची थी जिस में मानव अब दूसरों की बात समझने भी लग गया था और दूसरों को अपनी बात समझा भी पाता था।अब वो एक दूसरे की भावनाओं को भी समझने लगे।वो लोग अब संम्भावित खतरे और खतरनाक जानवरों से सावधान करके एक दूसरे की जान बचाने लगे।इस तरह इन भाषाओ से उन्हें फायदा मिलने लगा।अब वे जीवों के घातक हमलो से बचने में खुद को सक्षम महसूस  करने लगे।परन्तु कुदरती आपदाओं के सामने मानव खुद को अब भी असहाय और बौना ही महसूस करता था।जैसा कि आज भी हजारों- लाखो साल बाद भी मानव इन आपदाओं के सामने खुद को असाहय ही पाता है। इन आपदाओं और मौसमी चक्र से मनुष्य के मस्तिष्क में एक बात बैठ गई कि कोई शक्ति तो है जो इस तंत्र को गतिमान, नियंत्रित एवं व्यवस्थित करती है।सभी आपदाएं ज्यादातर आसमान से पृथ्वी की तरफ आतीं है। चाहे वो आसमानी बिजली का कड़कड़ाना एवंम कड़कड़ा के जमीन पर गिर कर वनास्पति और जीव जंतुओं का सर्वनाश करना या अत्यधिक वर्षा या बादलों के फटने से आई बाढ़ से तबाही मचाना।चाहे अत्यधिक सूर्य की तपीश से जल स्रोतों का सूख जाना और जंगलों में आग लग जाना।इन सभी घटनाओं में एक बात एक समान थी कि लगभग सभी आपदाएं आसमान से धरती की तरफ आती थी।इससे उनमें यह आस्था स्थापित हुई कि इन सभी शक्तियों को नियंत्रित करने वाला या वाले बादलों के उस पार कहीं रहते हैैं और जब वह पृथ्वी पर रहने वाले जीवों से रूष्ट हो जाते हैं तो उस के परिणाम स्वरूप ये आपदाएं आती हैं। इन भावनाओं से ओत-प्रोत मानव के जीवन में देवताओं और ग्राम देवतोओं की संस्कृति ने जन्म लिया।एक ग्राम देवता की मान्यता आमतौर पर सिमित क्षेत्र तक ही रहती थी।क्षेत्र बदलते ही ग्राम देवता भी बदल जाते थे।यानि हर क्षेत्र का अलग ग्राम देवता होता था। यहां मैं एक बात बताना आवश्यक समझता हूं कि आज भी ग्राम देवताओं की परम्पराओं में लोगों का विश्वास जस का तस है।मेरा पैतृक गांव भरथल भारत की राजधानी दिल्ली में पड़ता है।हमारे गांव के ग्राम देवता दादा मोटा नाम से विख्यात हैं।हमारे गांवों के आसपास के 2-3 गांवों  के ग्राम देवता वही है।वाकि और गांवों के अपने अलग अलग हैं।ये सिलसिला हर गांवों के साथ ऐसे ही चलता रहता है।ये परम्पराऐ आदिकाल से चली आ रही है।ग्राम देवता उक्त गांव का ही सिद्ध पुरुष,महा मानव या ऐसा जीव जिस ने आपदाओं में या किसी मुसिबत में से लोगो को निकाला हो या लोगों की भलाई के लिए कोई चमत्कार दिखाया हो या लोगों के कल्याण के लिए पूरा जीवन लोगों के दुखों को दूर करने में लगा दिया हो।यह उपाधि पाने वाला कोई भी हो सकता था।वो पुरुष,औरत या कोई जानवर तक भी हो सकता था। धिरे धिरे मानव को खुद के लिए कल्पनाओं में उन देेवताओं के रूप में सहयोगी मिल गया।जो हर जगह,हर स्थिति में उसके साथ होने का अहसास करवाता और उसे मुश्किल स्थितियों से निपटने के लिए आत्मबल और प्रेरणा देता।वो‌ अब उन देेवताओं को हर तरह से अपने साथ अपनी कल्पनाओं में रखता और अपने हर कार्य में उनसे मदद मांगता अब मानव मिली सफलता को देवताओं का आशिर्वाद समझता और असफलता को प्रभु का रूष्ट होना मानने लगा।अब वो देेेेवताओं की शक्ति और चमत्कारों पर दृृ़ृढ़ता से  विश्वास करने लगा। सदियों के सफर के बाद  सांकेतिक भाषा एवंम ध्वनी संंकेेेतो का विकास मौखिक भाषाओं केे रूप में हुआ।अलग अलग क्षेत्रो में अलग अलग मौखिक भाषाओं के स्वरूप विकसित हुए। इन भाषाओं के दैनिक जीवन में उपयोग अथवा पूर्णता विकसित होने के कई सदियों बाद उनमें से कुछ भाषाओं को लिपीबद्ध किया गया। विश्व में दो भारतीय भाषाओं तमिल और संस्कृत को सबसे पुरानी मौखिक भाषा का श्रेय प्राप्त है।कुछ विद्वानों का मत संस्कृत को और कुछ का मत तमिल को सबसे प्राचीन भाषा के तौर पर हासिल है। इन के साथ साथ मिस्र की काप्टिक भाषा भी लगभग संस्कृत और तमिल के ही समकालीन की भाषा मानी जाती है।इन तीनों में तमिल और संस्कृत भाषा आज भी बोलचाल मे इस्तेमाल की जाती है।तमिल बहुत बड़े क्षेत्र और बहुसंख्या में आज भी बोली जाती है जबकि संस्कृत बहुत ही सिमित क्षेत्र मे बोली जाती है।सनातन धर्म के प्रतिष्ठित मुख्य ग्रन्थ संस्कृत भाषा में ही लिखे गए हैं।इस लिए संस्कृत को देवताओं की भाषा जाता है।काप्टिकक भाषा को पुर्ण रूप से लुप्त हुऐ सदियां बीत चुकीं हैं।इसी तरह विश्व के सभी इतिहास के विद्वान, पण्डितो के विचार से यही दोनों भारतिय भाषाएं हैं जिन्हें सबसे पहले पूर्णता लिपीबद्ध किया गया। समय के साथ चलते चलते मानव की बुध्दि का भी भरपूर विकास हुआ।अब उसने अपनी सुरक्षा,रहन-सहन एवंम  सुगमतापूर्वक जीवनयापन के लिए नई-नई वस्तुओं के अविष्कार किऐ ।मानव अब जिन देवताओं को प्रत्यक्ष देखता था जैसे सूर्य देव, चन्द्र देव,अग्नि देव आदि की अराधना करने लगाऔर साथ ही साथ उन अलग-अलग देवी देवताओं को भी पूजने लग गया जिन्हें उसने खुद तो नही देखा पर किसी सिद्ध पुरुष, मुनियों,महा मुनियों, तपस्वी, साधू-संतों के मुख से शब्दों द्वारा उनके चमत्कार,उनकी सिद्धियां,उनकी शक्ति, उनके तेजवान रूप के अप्रत्यक्ष रुप में दर्शन किए और लोग उनको भी श्रद्धा पूर्वक पूजने लगा। गया। मौखिक बोली के विकास के बाद मानव अब सन्त , मुनियों के मुख से सुनी महामानवों की गाथाओं और उनके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चमत्कारों की लोक गाधाऐ और लोक गीत बनाने लगे।इन लोक गाथाओं और गीतो को ये अलग अलग जगहों पर जा के सुनने और सुनाने लगे। जिससे इन कथाओं और गीतों को प्रसार और प्रचार मिलने लगा।धरती पर अनेकों महामानवों ने पाप के नाश और मानव के जीवन में ज्ञान की रोशनी करने के लिए अलग अलग समय में,अलग अलग स्थानों पर, अलग अलग रूपों में अनेको बार मानव जीवन के कल्याण के लिए जन्म लिया और धर्म की स्थापना की। उन्होंने अपने सद्कर्मो ,सदाचारी धर्मनिष्ठ आचरण भरे  जीवनकाल में दुष्टो का नाश कर के खुद को परमात्मा का अवतार या अंश अवतार होने की प्राप्त मान्यताओं को सत्य प्रमाणित किया।समय समय पर पृथ्वी पर और अवतार, परमेश्वर पुत्र, पैगम्बर, सन्त, महात्मा का जन्म हुआ।इन महामानवों से प्राप्त ज्ञान, प्रेरणा से धरती के अलग-अलग जगहों मे नए-नए धर्मों की स्थापना हुई।आप यह जान कर आश्चर्यचकित रह जाएंगे की विश्व में मानव सभ्यता का प्राचीनतम धर्म सनातन धर्म को माना जाता है। सनातन धर्म का आरम्भ और विकास भारत में ही हुआ। यहां एक बात लिखना आवश्यक समझता हूं कि आज विश्व में अनुयायियों की संख्या के हिसाब से क्रमश ईसाई, इस्लाम,सनातन धर्म सबसे बड़े धर्म हैं।इन तीनों धर्मों के अनुयायियों की जनसंख्या यदि मिला दें तो विश्व की कुल जनसंख्या का सतर(70%) प्रतिशत बनता है।इन तीनों धर्मों मे मानव जीवन का पृथ्वी पर आरम्भ की कथा लगभग एक जैसी ही है।सनातन धर्म के अनुसार ब्रह्मा जी ने प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की रचना कर उनको क्रमश मनु और सतरूपा नाम दे कर पृथ्वी पर मानव सभ्यता के आरम्भ के लिए भेजा।मनु को आदि मनुष्य भी कहा जाता है।आदि का मतलब होता है आरम्भ। अब हम अगर ईसाई धर्म की बात करें उनकी मान्यता है कि परमेश्वर ने पुरुष और स्त्री की रचना की और नाम दिऐ ऐडम और ईव और इस्लाम मत के अनुसार अल्लाह ने पुरुष-स्त्री को रचा और नाम दिए आदम और हव्वा। इसके अतिरिक्त एक और कथा बिल्कुल जस की तस सनातन,यहूदी , ईसाई, इस्लाम धर्मों के पवित्र ग्रंथों में लिखी हुई हैं। जल प्रलय घटना की कथा सनातन धर्म, यहूदी धर्म, ईसाईधर्म, इस्लाम धर्म में बिल्कुल एक समान है। सनातन धर्म में जल प्रलय और विष्णु भगवान के मत्सय अवतार की कथा के रूप में वर्णित है और बाकि तीन धर्मों में हजरत नूह की कश्ती के नाम से लिखी हुई है। 
मनु और जल प्रलय-   इस प्रमुख घटना की कथा में भगवान विष्णु मत्स्य अवतार में प्रकट हुए और राजा सत्यव्रत जिनको मनु वैवस्वत भी कहते हैं को बताया कि आज से सातवें दिन जल प्रलय आएगी और सम्पूर्ण पृथ्वी समुद्र में समा जाएगी। 

           तुम इन दिनों के भीतर एक अति विशाल नौका तैयार करवा लो। तुम समस्त प्राणियों के सूक्ष्‍म शरीर,सब प्रकार के फल,फूल,अन, औषधी आदि के बीजों और सभी वेद ग्रंथों को लेकर सप्‍तर्षियों के साथ उस विशाल नौका में बैठ जाना-पहचाना।बादलों से बरसती वो प्रलय अपने साथ भयंकर आंधी और तूफान भी लाएगी। कहीं तुम्हारी  नौका डगमगाती हुई पानी के ज्वार और भंवर में फंस कर पलट या डूब ना जाए इसलिए मैं मत्स्य रूप में तुम्हारी नौका सहारा देकर बचाता रहूंगा। मैं जल प्रलय के अंत तक तुम्हारी नौका बचाता और खींचता रहूँगा।जब जल प्रलय अपने चरम सीमा पर पहुंची तब श्री मत्स्य अवतार के रूप में विष्णु जी ने नौका को हिमालय की चोटी से बाँध दिया। भगवान मत्स्य की कृपा से सभी वेद‌ फिर से पृथ्वी पर धर्म का पथ प्रकाशित करने फिर से पृथ्वी पर विराजमान हुए और जो भी प्राणी,जीव और अन्य आवश्यक वस्तुओं के बीज जो नौका में सप्त ऋषियों के साथ बचे उन्हीं से ही प्रलय के बाद पृथ्वी पर फिर से जीवन का आरम्भ हुआ।  
नूह की यहूदी,ईसाई और इस्लाम धर्म में कहानी- नूह को यहोवा यानि परमेश्वर ने आकर कहा कि मेरे हुक्म से आज से सातवें दिन पृथ्वी पर जल प्रलय आएगी। उन्होंने नूह को इन सात दिनों से पहले पहले बहुत बड़ी कश्ती बनवाने को कहा और कहा कि जल प्रलय के दिन तुम सभी प्रकार के प्राणियों का एक एक जोड़ा और अपने परिवार के साथ इस कश्ती में बैठ जाना। उन्होंने कहा मैं तुम्हारी सहायता के लिए तुुुम्हारे साथ ही रहूंगा।

        परमेश्वर द्वारा मुकर्रर जल प्रलय का दिन आ गया। पृथ्वी पर जल अत्यंत तेज गति से बढ़ने लगा। पृथ्वी पूरी तरह जलमग्न हो गई।पहाड़ों कि चोटियां तक भी डूब गई और सब कुछ डूब कर नष्ट हो गया जो भी कश्ती से बाहर था।इसलिए वे सब पृथ्वी पर से मिट गए। केवल हजरत नूह और जितने प्राणी उनके साथ कश्ती में थे, वे ही बच पाए। जल ने पृथ्वी पर डेढ़ सौ दिनों तक पहाड़ों को चोटियों तक डुबोए रखा। फिर धीरे-धीरे जल स्तर निचे उतरने लगा तब एक बार फिर से धरती प्रकट हुई। जो प्राणी कश्ती में बच गए थे उन्ही से पृथ्वी पर मानव और जीवन की फिर से शुरूआत हुई। 
अब आप ने उपरोक्त् दो घटनाओं का वर्णन इन धर्मों में से पढ़ा जो कि लगभग एक समान हैं । इन सभी धर्मों में पृथ्वी पर मानव जीवन की शुरुआत, प्रलय और दोबारा मानव जीवन के आरम्भ की मान्यता एक ही है यानी इन सभी धर्मों का उदगम स्त्रोत और आधार एक ही है।
                                                          ..... क्रमश

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