पापी मन's image
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हर पल रहती आपा धापी

रे मन ! तू बड़ा ही पापी।


तू गैरों के पीछे भागे

और अपनों से करता छल

रुक जा रे मूढ़ मना

कितनी गहरी ये दल दल


तूने भटक भटक कर सारी दुनिया नापी

रे मन ! तू बड़ा ही पापी ।


किस मृगतृष्णा में तू उलझा

मत खेल, शिकार हो जायेगा

उलझ सत्य से अभी इसी वक्त

फिर सब यत्न बेकार हो जायेगा


आज करे बरबाद कल की चिंता व्यापी

रे मन ! तू बड़ा ही पापी।






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