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औरों के कंधों पर वो चढ़ता रहा।

और इस तरह कद उसका बढ़ता रहा।।

दीवारें खड़ी कर ली अपने चारों ओर।

और ख़ुद ही अपने आप से लड़ता रहा।।

न खिड़की न दरवाजा ख़ुद के वास्ते।

जिस्म से बढ़ा पर जमीर से पिछड़ता रहा।।

घिर गया वो खुशामदीदों की फौज़ से।

झूठी प्यार की बातें दोस्तों से गढ़ता रहा।।

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