मेरा कारवां's image
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उफ!
मैं किन प्रश्नों को हल कर रहा हूँ।
मैं किसको छल रहा हूँ।
क्योंकि
मेरे
कदमों की ठोकर खाते।
तलवों से पलटते।
एड़ी की चोट सहते।।
ये धूल कण, रास्ते,
रास्तों के किनारे,
छोटे-बड़े पौधे,
पेड़,
पेड़ों के झुरमुट।
मेरे आगे बढ़ने से रूठ रहे हैं।
क्यों सब पीछे छूट रहे हैं?
मगर!
विस्तृत आकाश की छाया।
माँ प्रकृति की माया।।
सूर्य रश्मि का उजाला,
धूप की गर्माहट।
हवा की बाहें और
मंज़िलों की आहट।।
निराशा निगल,
सूर्य ढल रहे हैं।
धूप से जलते स्वेद कण,
साथ कब से चल रहे हैं।
तो मैं अकेला कहाँ?
मुझ संग तो है कारवां!
✍मुक्ता शर्मा त्रिपाठी 

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