कोयल की बोली's image
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*कोयल *

कोयल तुम हो काली - काली,

तुम्हारी आवाज़ है बड़ी निराली,

आकर सुबह मेरे बालकनी के सामने,

चमेली फूलों की डाली पर बैठ,

अपनी सुरीली आवाज बिखेर,

सबके मन को हर लेती हो,

जो दर्द तुम्हारे अंदर है,

वह हम नारी में छिपा रहता है,

तुम आज़ाद पक्षी ह़ो अपनी

बोल सुना जाती हो,

हम नारी तो आजाद नही,

बातें अनकही रह जाती है

खेतो में सरसों के पीले फूल लहराते,

आओ कोयल तुम्हें बसंत ऋतु बुलाते।

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