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खामोशी से कमजर्फों की तरह हम

मारूफ आलममारूफ आलम September 12, 2021
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खामोशी से कमजर्फों की तरह हम

टूटते रहे हरपल हर्फ़ों की तरह हम


तेरी चाहत का जजिया जमाने को

चुकाते हैं रोज कर्जों की तरह हम


तेरी नजरों मे थोड़े ही सही लेकिन

बुलंद रहेंगे सदा,दर्जों की तरह हम


महर माफ किए तूने मगर फिर भी

अदा करते रहे फर्जों की तरह हम


दवाएं बेअसर हैं आराम ना आऐगा

शामिल हैं तुझमे मर्जों की तरह हम

मारूफ आलम

©

मायने

महर-निकाह के वक़्त तय की जाने वाली रकम

जजिया- एक प्रकार का कर












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