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लिख रहा हूँ आज फिर मन ,अनमने मन से | 
अनमने मन से भी मजाक भरे तन से भी॥ 
मन का क्या घोर धनघोर उदास् कभी भी, तन का क्या हमेशा उसी तरह तरह का ही ॥
मन की छाया केवल आँखों से दिखती है। शब्दों से घुल मिलकर कर झर झराती बहती है।
तन का क्या हंसा हंसा नही हसां नहीं हँसा।
लेकिन दिखा बैसा ही जैसा है बैसा || 
तन में तोआखें और जुवान मन की कह आती है।
बोलो, बोलो ना बोलो तो भी बैरन बोल जाती है।
आँखे भी तो हसकर बहकर कुछ भी कहकर।
कह जाती है अनकही बातें भी कुछ ना कहकर।
शब्द ही तो कहते है लिखते है मन की बातें। 
क्या लिखें अब क्या कहे, दिन कहें या रातें॥ 
पूर्ण विराम दे दिया है अभी अपनी कलम को ।
लिख कर कहदी  अपनी बातें कागज और कलम को।। 

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