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कुनमुनी सी धूप का

ठिठुरती हुई रातों का

सर्द महीना गुज़र रहा है

एक और साल नया

अब दस्तक दे रहा है


कुछ साथी खो रहे

कुछ नए साथी मिले

खोने पाने के खेल में

समय का बेखौफ परिंदा

हवा बन के उड़ गया।


मं शर्मा (रज़ा)


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