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मलय सुवासित

पुलकित मन

अंग अंग में

मीठी चुभन

है रोम रोम

सुरभित तन

मन उपवन में

खिले सुमन


धरती ने धारे

सिंदूरी वसन

पंछी उन्मुक्त

पहुँचे गगन

शिशु खोल रहे

अलसित नयन

घर लौटो प्रिय

करके जतन।



मं शर्मा (रज़ा)

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