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दिन बीते रतियां बीती

प्रतीक्षा की घड़ियां न बीती

ऋतु आईं ऋतु चली गईं

विरह की सदियां न बीती

बीते दिनों की बीती बातों से

ह्रदय गगरिया हुई न रीती ।


  ( मं शर्मा रज़ा)

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