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खाक ही खाक है ज़मीं पर यारो

चलो आसमां पर चलके देखते हैं

सुना है ख्वाब मुकम्मल नहीं होते

किसी ख्वाब की ताबीर होके देखते हैं

आईना दिखाता नहीं सच्ची सूरत कभी

किसीकी आँखों में अपना अक्स देखते हैं।



मं शर्मा( रज़ा)

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