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चक्रव्यूह


तुम्हारे जन्म के समय ,

चेहरों की उदासी से शुरू होकर,

तुम्हारे कौमार्य पर

तनती भृकुटियों की रेखा से होते हुए

 सदा सुहागन रहो के आशिर्वाद तक,

पंक्ति दर पंक्ति

रचा गया है यह चक्रव्यूह ।


अब जबकि तुम लड़ते लड़तपहुँच चुकी हो भीतर तक।

तो बस यह याद रखो की

की तुम अभिमन्यु नहीं 

अर्जुन हो इस महाभारत की ।


और तुम्हें बखूबी ज्ञात है

हर चक्रव्यूह का रहस्य ।


तुम्हें कर्म पथ का 

बोध कराने को ही कही गई है गीता ।

स्वधर्म की रक्षा के लिए

तुम कभी भी

खींच सकती हो प्रत्यंचा।


- ममता पंडिते


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