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#गुज़र जाती गर होती तू रहगुज़र।

 इक क़दम साथ न थी पर अब क्यूँ।।


#आखरी सफ़र करने चले हम तो।

 जनाज़े वक़्त छज्जे पर खड़ी अब क्यूँ।।


#खुली आँखों से ढोकरें खाई अंधेरों मे।

 चिराग़ लिए राह मे खड़ी पर अब क्यूँ।।


#रिश्तों मे न रहे न रिश्तेदारों मे।

 अब तुम्हे निभाना है पर अब क्यूँ।।


#बाज़ार मे आजमाईश है तेरी बेदख़ल।

 क़ीमत लगाई तो लगाई पर अब क्यूँ।।


#वजूद है न नामोनिशान अब बेदख़ल।

 कर रहे हो क़ब्र ख़ुदाई पर अब क्यूँ।।


#महकाई बहुत सी महफिले हमने।

 बाद मरने के रगड़ के धुलाई अब क्यूँ।।


#गुज़रे अरसा हो गया बेदख़ल।

 दी मौत मुबारक़ पर अब क्यूँ।।

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