अनियमित's image
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दुनिया को सुदृढ़ दिखता हूं
कौन समझाए 
मैं बिखरा भी हूं तो सिमटा हुआ सा...

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सब वैध होता है पुरुष के लिए,
स्त्री को नियमित रहना पड़ता है।
वो कुछ भी कह सकता है, 
उसे सोचना नहीं पड़ता
हाय! कितनी लाचार स्त्री 
तुझे हर जगह, हर बार,
सोचना पड़ता है...

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नष्ट कर देना चाहती हूं मैं
पल रही उस महीन किरण को भी
जो बंधन होने का वैध कारण है
वही दुख का कारण है...

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कहना है बहुत कुछ
समय बोलने नहीं देता
सब हाथ में है, पर
सब कुछ हाथ में नहीं होता...


_महिमा ठाकुर

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