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“राजनीति या अनीति”

Lalit SarswatLalit Sarswat May 11, 2022
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राजनीति या अनीति


स्वप्न में सोया हर वो मानव

जो कहे राजनीति में कहाँ दानव

प्रपंचों और कुंठा से ग्रसित

राजनीति हो रही अनैतिक। 


कभी किसी कालखण्ड में

राजनीति जुड़ी मनु-स्मृति से

अब तार तार कर रही सभ्यता

खंडित करती देश की संप्रभुता। 


शृगालगिद्धोंसर्पों से आच्छादित

विकृत और तिरस्कृत,

जिह्वा अंगारितविष दंश लिए,

नग्न नाच करतीमलेच्छित। 


कहते सभी की

राजनीति है कमल कीच का

हस्त मलीन करना

कार्य सिर्फ़ अब नीच का

अपितु इसी कीच में

उपज रहा शैल तृष्णा का

और गिर रहेकूद रहे,

लिपट रहे इस तमस् से

पाने यह पुष्प निज-स्वार्थ का। 


क्यूँ झेल रहे 

इन दुर्दांत दस्युओं को

क्यूँ सेल रहे 

इन मानवता के भक्षियों को

नपुंसक हमकब कैसे हो गए?

इन भेड़ियों के भक्त कैसे हो गए?


व्यापार इनका

द्वेषआतंकलिप्सा युक्त

तिजोरियाँ भरने हेतु

देश प्रेम से होते विमुख

धर्म-जात-पात पर दंगा कराते

भाई को भाई से मरवाते

और सींच रहे इस रुधिर से

अपने स्वार्थ वृक्ष को

फलित करते इनके जैसे

अनगिनत दनुज को

जो श्वान गुणों से युक्त

हिंसा-भ्रष्टाचार करते प्रयुक्त

और अरी से ढके हुए

देश का सौदा कर रहे

ना किसी से यह भयभीत

निर्धन हो रहा तिरस्कृत

ठहाके गूंज रहे दुष्टों के

प्रशासन के गलियारों में

और जनता शोषित 

हृदय अंगारित

और पूछ रहे निज से अब

एक और

स्वतंत्रता का आंदोलन होगा कब?


यज्ञ आज विकराल करना होगा

आहूत स्वयं को करना होगा

इन पिशाचों के रूण्ड-मुण्ड से

देश को स्वतंत्र करना होगा

और तब मचेगा प्रलय अधीर

डगमगायेगा सिंघासन स्थिर

और एक ही स्वर गूंजेगा

चहुं दिशाओं में

की अब राजनीति को

पवित्र होना होगा।


देखना

स्वर्ण भवन कम्पित होंगें

राजनेता सब दण्डित होंगे

जनता की एक हुंकार से

क्रंदन करते कृपा हेतु

हस्त इनके सौ बार जुड़ेंगे। 


झकझोरो अपने अंदर के

चाणक्य-आम्बेडकर को

करो जागृत 

आज सोए वल्लभ को

लाल बहादुर को ओढ़ 

अटल समान हुंकार भरो

रहे बना देश स्वयंभू स्वतंत्र

एक जुट हो 

प्रतिज्ञा आज 

अनल की करो

और कहो सब मिल की 

प्रजातंत्र की रक्षा करेगें

अब किसी से नहीं डरेगें 

सच्चाई और देशप्रेम के निमित्त

राजनीति को अब पवित्र रखेगें।

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