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“क्या ठीक हूँ मैं?”

Lalit SarswatLalit Sarswat May 10, 2022
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क्या ठीक हूँ मैं?”


था बैठा तनहा 

किसी एक सोच में

जाम का प्याला

हाथों में लिए

बेख़बर दुनिया से

क्यूँकि

दुनिया छोड़ रही थी

साथ मेरा 

धीरे धीरे से

और तुम आज पूछ रहे मुझे

क्या ठीक हूँ मैं?


कुछ भी ठीक नहीं दिखता 

अब दूर तलक़ तक मुझे

समझा जिन्हें अपना

गिद्ध बन 

वही मांस मेरा नोच रहे

और लुत्फ़ उठा रहे

मेरी चीख़ पुकार का

मेरे दर्द का और

जिस्म से बहते मेरे खून का

उखाड़ फेंकनें को तैयार

उजाड़ बना देने को तैयार

मेरी दुनिया को 

और बैठे मुस्कुरा रहे

मेरे हर एक अश्क़ पर

जैसे कुछ हुआ ही नहीं

और तुम आज पूछ रहे मुझे

क्या ठीक हूँ मैं?


था जिन पर यक़ीन मुझे

ख़ुद पर से भी ज़्यादा

आज वही देख रहे

शक़ की निगाहों से मुझे

उतार रहे सरे बाज़ार में

इज़्ज़त जो कभी थी मेरी

और नीलामी लगा रहे

मेरी ज़िंदगी की

ख़रीददार वही 

जिसकी बोली थी सबसे कम

क्या इतनी सस्ती है

यह ज़िंदगानी मेरी

और तुम आज पूछ रहे मुझे

क्या ठीक हूँ मैं?


देखो अब तुम भी 

तमाशा जो मेरा हो रहा

कैसे लड़ रहा अकेला

उन तूफ़ानी हवाओं से

जो दुश्मनों ने मेरे

छोड़ी मेरे अक़्स पर

और लड़ रहा 

अपनी बदक़िस्मती की

उन उठती ऊँची लहरों से

और थकता चला जा रहा

लड़ता चला जा रहा

जब तक निढाल हो

गिर ना जाऊँ 

और तुम आज पूछ रहे मुझे

क्या ठीक हूँ मैं?


मेरी ज़िंदगीमेरा वजूद

जिसका मालिक खुद मैं 

अपनी कश्ती का 

नाविक मैं 

और देखो!

मैं सम्भाल नहीं पा रहा 

खुद को

और डूबती मेरी कश्ती को

और तुम आज पूछ रहे मुझे

क्या ठीक हूँ मैं?


एक बड़ा हिस्सा ज़िंदगी का

है जिया मैंने

बनाने वजूद एक अपना

इतना बड़ा 

जो है कईयों का सपना

और आज उसी वजूद को

मेरे उसी नाम को

मिटाने की कोशिशें हो रही

जिनको बनाने में 

लूटा दी पूरी उम्र मेरी

और अब धीरे धीरे इन्हें

वो छीन रहे मुझसे

अस्तित्व मेरा अब बिख़र रहा

जैसे रेत फिसल रही 

मुट्ठी से मेरी

जिसके लिए लड़ रहा था

पूरी दुनिया से

अपनी एक दुनिया बनाने

एक मुक़ाम बनाने

वही सब मेरा अब लुट रहे

कौन?

वही जो कभी मेरे अपने थे

अब मुखौटा लगाए

एक झूठी हंसी चेहरे पर लिए

और ख़ंजर घोंप रहे

मेरी पीठ पर

मुझे गले लगा

मुझे मेरी औक़ात बता

मेरा मंज़र मुझसे छीन रहे

और तुम आज पूछ रहे मुझे

क्या ठीक हूँ मैं?

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