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ईमान


बात जो होती ज़िंदगी की

तोहफ़े में दे ही देता,

सवाल था ईमान का

कैसे किसी को छिनने देता?

ख़ून पसीने से कमाई यह दौलत

बाँट कैसे देता,

तौहमत यह ज़लील करने वाली

औढ़ कैसे लेता?

नहीं माँगता ऐशों आराम

भीख़ यह कैसे ले लेता,

सीख़ मिली ग़ुरबत में

ईमान को भुला कैसे देता?

यह जश्नयह महफ़िल

शानो-शौक़त ज़िंदगी के,

सराब ये हराम सब

कैसे रूह को इन्हें छूने देता?

ख़ाब पूरे नहीं करूँगा

ज़िल्लत की राह चलकर,

ख़ुदा के ईमान को

मुझसे रुख़सत कैसे कर देता?

अज़ाब उठता सीने में मेरे

अज़ियत रूह को हो रही,

कोई दाग़ ना लगे दामन पर

फ़िक्र यही हो रही,

रफ़ाक़त रहता ईमान जब

ख़ुलूस रहे ज़िंदगी मेरी,

तक़ाबुल हो ख़ुदा भी तो

पशेमाँ ना हो रूह मेरी।

जफ़ा ना हो दहर में कोई

सबात रहे ईमान की,

सहर रहे हयात में

कभी क़ज़ा ना हो ईमान की।

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