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आशा


एक दीप जला मन में

जैसे सूर्य चमकता तिमिर में

इतिहास रचने को आतुर

मैं मस्त पवन अम्बर में

बुदबुदा एक मुस्कुराहट का

सजा मेरे अधरों पर

शब्द मेरे नाम के

उकरे जब पाषाणों पर

निमित्त करते पूरे

सपनें मेरे जीवन के

जो पार कराते नैय्या 

चप्पू वो आशा के

नव-अध्याय लिखूँ अब

आशा की स्याही से

अब डर ना मुझे बंधन का

जब पंख लगे आशा के।


बस यही रहा सोच अब 

अपने मन-मशतिष्क में

कैसे एक राग बनाऊँ 

आशाओं के जीवन में 

जो दे एक जागृति मुझे

जो उफान दे शिथिल शिरा में

जो हुंकार भरे मेरे मन में

और टंकार भरे पुरंदर में

जिसे देख कौंधे बिजलियाँ

और फड़के भुजा मेरी

बस अब सुनाता 

कुछ शब्द

जो है समेटे निज में

चिंगारी मेरी आशा के लिए। 


बस आशा रहे तेरे निज में

ना डिगे तू कठीन डगर में

ना डरे उन तूफ़ानों से

ना डरे ऊँची चट्टानों से

ना डरे कभी नुकीले कांटो से

ना डरे कभी अन्धकारों से

रहना अडीग अपने पथ पर

यही संकल्प रहे तेरे भीतर

और यही सोच ले मन में मेरे

संघर्ष करूँ मैं जीवन भर

ले तलवार आशा की हाथों में

द्वन्द करूँ निरंतर मैं अब

और पाऊँ अपनी विजय मैं

जिसे देख प्रफुल्लित होऊँ मैं।


देखोबहुत हुआ अब खोना

अब संताप करो ना

मेल मिलाप जीवन का

सुख के क्षणों से करो ना

द्वन्द किया बहुत अब

तिक्षण वेदनाओं से

टकराओ ऊँची लहरों से अब

ना घबराओ गहराई से

बस रखना चैतैन्य में अपने

तिनका अब भी आशा का

है तेरे हाथों में

फिर पार करेगा पयोधि तू

निश्चिंत रह 

किनारा स्वयं बनेगा तू। 


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