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सहमा-सहमा आँख का दरिया 

जाने कब सैलाब हो जाये

 

तुम मिलो तो न मिलो 

मिलो तो ख़्वाब हो जाये 


आओ जो तुम समंदर से मिल कर 

ज़म-ज़म का आब हो जाये 


हो जाओ जलवाफरोश अब 

जंगल की आग हो जाये 


वाक़िफ कर दो मुझे हसरतों से मेरी 

कभी दीदार-ऐ-महताब हो जाये 


वो मसरूफ रहते है इस कदर 

गोया मरना भी इंतखाब हो जाये 



मेरी शिद्दतों का धुआँ उठा है अभी 

जैसे चराग़ों को शबाब आये 


बेसब्र रहते है हम आज कल 

क़त्ल कर दो तो इंक़लाब आये 


मेरे हुकूक मैं है सदमे और कई 

पर ख़ानाख़राबी मैं तुम नायाब आये 


ग़मग़ुसार हुए दश्त में नहीं हम 

फिर क्यों यह फितूर बार-बार आये 

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