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Kumar VishwasPoetry1 min read

गौरैया और गिद्ध

Kritika KiranKritika Kiran September 27, 2022
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किसी संघर्ष के दौरान

ताप का शिकार हुई ज़मीं पर

जब ख़ून की छींटें पड़ती हैं

तब छनछना कर उठता है अराजकता का धुआँ...


पेड़ों पर गर्दन झुकाए आराम करते गिद्धों के

सिर उठ जाते हैं;

और इनका समूचा झुंड, पूरे पंख फैला कर

आसमाँ में करता है तांडव...

बेधड़क!

वहीं दूसरी तरफ़ एक गौरैया,

चोंच में धान का बीज दबाए

भागती है घोंसले की ओर

और किसी मासूम से बच्चे की तरह

डर से पंखों में छुपा लेती है मुँह अपना...


गिद्धों ने हमेशा चाहा है दुनिया को बनाना

एक मरुस्थल...

चाहे हैं सिर्फ़ शव ही शव...

वहीं इन गौरैयों ने चाहा है

ब्रह्माण्ड भर का प्रेम...

अन्न से भरे..खिलखिलाते आँगन।


सालों से मेरे घर की मुंडेर पर

कोई गौरैया पानी पीने नहीं आई...

हाँ! गाहे बगाहे, दुनिया भर के

गिद्ध दिख जाया करते हैं, एक साथ

कभी संसद के गलियारों में

तो कभी टीवी पर....समाचार पढ़ते!


- कृतिका "किरण"


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