अज्ञात का भान's image
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कण कण है प्रतिकृति

उस श्रृष्टा की अंशभूत 

है जो कण कण में

 

कारण है वो सकल कर्मों का

कर्ता है वो सकल कर्मों का

कर्मफल वो सकल कर्मों का 


एक डर है जो कुछ के लिए

एक आस्था है जो कुछ के लिए 


जिस के लिए कोई कुछ नहीं 

सब कुछ है वो उनके लिए

 

जिसकी व्याख्या संभव नहीं

 डर और आस्था समाज के

 रूप रचे दिए अनके उस के

 

वो है या नहीं जो माना जाता

मन मन में कण कण में 

ज्ञात अज्ञात क्षण क्षण में...


© किशन लाल. 

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