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Women's Day Shayari | Kavishala

KavishalaKavishala June 16, 2020
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तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन 

तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था 

 - असरार-उल-हक़ मजाज़



एक औरत से वफ़ा करने का ये तोहफ़ा मिला 

जाने कितनी औरतों की बद-दुआएँ साथ हैं 

 - बशीर बद्र



औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 

जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया 

 - साहिर लुधियानवी



बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है 

मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो इस दुनिया की औरत है 

 - असरार-उल-हक़ मजाज़



बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं 

और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं 

 - इफ़्तिख़ार आरिफ़



कौन बदन से आगे देखे औरत को 

सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में 

- हमीदा शाहीन



शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास 

रौनक़ें जितनी यहाँ हैं औरतों के दम से हैं 

 - मुनीर नियाज़ी



तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ 

मिरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ 

 - साजिद सजनी



वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंग 

इसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ 

 - अल्लामा इक़बाल



औरत को समझता था जो मर्दों का खिलौना 

उस शख़्स को दामाद भी वैसा ही मिला है 

 - तनवीर सिप्रा



तमाम पैकर-ए-बदसूरती है मर्द की ज़ात 

मुझे यक़ीं है ख़ुदा मर्द हो नहीं सकता 

 - फ़रहत एहसास



जिस को तुम कहते हो ख़ुश-बख़्त सदा है मज़लूम 

जीना हर दौर में औरत का ख़ता है लोगो 

- रज़िया फ़सीह अहमद



शो-केस में रक्खा हुआ औरत का जो बुत है 

गूँगा ही सही फिर भी दिल-आवेज़ बहुत है 

- कृष्ण अदीब



निकल के ख़ुल्द से उन को मिली ख़िलाफ़त-ए-अर्ज़ 

निकाले जाने की तोहमत हमारे सर आई 

- अज्ञात



देख कर शाइ'र ने उस को नुक्ता-ए-हिकमत कहा 

और बे-सोचे ज़माने ने उसे ''औरत'' कहा 

- शाद आरफ़ी

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