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रश्मि रॉकेट : एक भारतीय महिला एथलीट की कहानी !

Kavishala ReviewsKavishala Reviews October 17, 2021
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हार-जीत परिणाम है,

कोशिश हमारा काम है!

फिल्म निर्देशक : आकर्ष खुराना

फिल्म की कास्ट : तापसी पन्नू, प्रियांशु पैन्यूली, अभिषेक बैनर्जी, सुप्रिया पाठक, आकाश खुराना, मनोज जोशी, चिराग बोरा, वरुण बडोला, सुप्रिया पिलगांवकर, श्वेता त्रिपाठी।

फिल्म का समय : 02:09

फिल्म प्लेटफॉर्म : zee5


समीक्षा :-


हार-जीत मायने नहीं रखती आपके लिए महत्त्वपूर्ण है आप हिस्सा लें और अपनी कोशिश को न छोड़े।

आकर्ष खुराना के निर्देशन में बनी फिल्म रश्मि रॉकेट हाल ही में रिलीज हुई है ,जो 'लिंग परीक्षण' जैसे गंभीर मुद्दे को उठाती है। बात करें फिल्म कास्ट की तो लीड रोले में अभिनेत्री तापसी पन्नू हैं वही प्रियांशु पैन्यूली, अभिषेक बैनर्जी, सुप्रिया पाठक, आकाश खुराना, मनोज जोशी, चिराग बोरा, वरुण बडोला, सुप्रिया पिलगांवकर, श्वेता त्रिपाठी कास्ट का हिस्सा हैं। यह एक पारिवारिक और मनोरंजक फिल्म है जिसका उद्देश्य स्पोर्ट्स में जेंडर टेस्ट के खिलाफ एक आवाज उठाना है। हम देखते हैं कि महिलों की भागीदारी खेल में औसतन कम रहती जिसका कारण है मानसिकता जिसके चलते लड़कियों को खेल में आगे बढ़ने का प्रोत्साहन नहीं मिलता यह फिल्म सीधे तौर पर उस मानसिकता पर प्रहार करती है जिसमे दिखाया गया है किस तरह केवल नियमों के नाम पर खिलाड़ियों को अयोग्य करार कर दिया जाता है। महिला खिलाड़ियों को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है उन समस्याओं को इस फिल्म के माध्यम से दर्शकों तक पहुँचाया गया है। ये फिल्म वास्तव में एक सन्देश है उन लड़कियों के लिए भी जो स्पोर्ट्स में दिलचस्पी रखती हैं। महिला खिलाड़ियों को हौसला और प्रोत्साहित करने का कार्य करती यह फिल्म सिखाती है की वास्तव में हार-जीत मायने नहीं रखती आपके लिए महत्त्वपूर्ण है आप हिस्सा लें और अपनी कोशिश को न छोफिल्म में कुछ दृश्य ऐसे भी हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं हैं। उदाहरण के लिए भुज में सालो पहले आया भूकंप जिसका रूपांतरण इस फिल्म में दिखाकर पिता की मृत्यु का कारण बनाया गया है, पर उसी मैदान में दौड़ती हुई रश्मि को कुछ नहीं हुआ, जो वास्तविक नहीं लगा।


"मेरी रॉकेट! जा पतंग लेकर आ!"


फिल्म में प्रस्तुत कहानी भुज की लड़की रश्मि की कहानी है जो बहुत तेज भागती है। रॉकेट की रफ़्तार से भागने के कारण उसे रॉकेट कहते हैं।


फिल्म का सारांश :-

5 अक्टूबर 2014 की रात को, एक गर्ल हॉस्टल में दो पुलिस वाले घुस कर बोलते हैं "कंप्लेन हुई ही है कि यहां पर एक लड़का घुस आया है ", और सीधा एक कमरे पर जा दरवाजा खटखटाते है। वहां रश्मि वीरा (हीरोइन) होती है ,जो पूछती है "आप कौन हो? ", पर पुलिस वाले उसे 'थप्पड़ मारते हैं',और बिना महिला पुलिस के अपने साथ ले जाते हैं। 

वहीँ से कहानी को १४ साल पहले मोड़ दिया गया है ,जिसमे रश्मि के बचपन का दृश्य दिखाया गया है जिसमे माता-पिता पतंगबाजी कर रहे हैं और मां छोटी रश्मि को फ्रॉक पहनने को कहती है। पर उसे जींस पहनना है, तो पिता बोलते हैं "तुम्हें जो पहना है वो पहनो "।जिस पर पुराने सोच में जीने वाली रश्मि की माँ बोलती है कि "लड़की है कुछ तो नियम रखो "। परन्तु नए सोच में जीने वाले और अपनी बेटी को आसमान की ऊंचाईयों के ख्वाब दिखाने वाले रश्मि के पिता उसे बोलतें हैं "अपने मन की सुनो "। माँ पापा के बिच फसी छोटी रश्मि फ्रॉक के नीचे जींस पहन कर मां-बाप दोनों को खुश कर देती है। तभी पतंग कट जाती है। पिता रश्मि को बोलते हैं "मेरी रॉकेट ! जा पतंग लेकर आ " और बाकी लड़के जो कटी पतंग को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं, उनको रश्मि पीछे छोड़ देती है और पतंग हासिल कर लेती है। मां-बाप की नोकझोंक में छोटी रश्मि बड़ी हो जाती है और भुज में ट्रैक गाइड बन जाती है। एजाज कुरैशी एक आर्मी के बड़े अफसर हैं जो रश्मि को बेटी मानते हैं। रश्मि उनसे मिलने जाती है जहाँ वह कैप्टन गगन (हीरो) से उसे मिलाते हुए बताते हैं कि "ये मैराथन की ट्रेनिंग के लिए अपने साथियों के साथ यहां आए हैं तो तुम उन्हे ट्रैक लाइन की सैर करादो "। इस तरह से कैप्टन, उसके दोनो साथी व रश्मि टूर करते हैं। जहाँ गगन का एक साथी गलती से माइन के पास जाने वाला होता है, जिसने हेडफोन लगा रखे होते हैं तभी उसे बचाने के लिए दौड़ते हैं, जिनमे रश्मि उनसे ज्यादा तेज दौड़कर उसे बचा लेती है। जिस से गगन प्रभावित हो जाता है। एजाज कुरैशी गगन को बताते हैं कि "यह हमारी रॉकेट है बचपन से यह बहुत तेज भागती है"। गगन रश्मि की मां से मिलता है और कहता है कि आने वाली दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए रश्मी को बोले। जिस पर रश्मि गगन को बोलती है कि "मुझे नहीं दौड़ना क्योंकि बचपन में एक दौड़ प्रतियोगिता में जब मैं भागने लगी तभी भुज में भूकंप आ गया तब मेरे पिता वही स्टेडियम में थे और दूसरों को बचाते-बचाते खुद मलबे में दबकर मर गए। जिससे मुझे डर लगता है कि कुछ और ना हो जाए"। परंतु गगन, उसे प्रोत्साहित करता है और वह भाग लेने को मान जाती है। गगन उसका कोच बनता है। धीरे-धीरे रश्मी कई दौड़ जीतती है और "रश्मि रॉकेट" के नाम से प्रसिद्ध हो जाती है।


"भागते भागते कब तू भगोड़ी हो गई पता ही नहीं चला !"


 एथलेटिक्स एसोसिएशन रश्मि को नेशनल लेवल पर दौड़ने के लिए बुलाती है। जहाँ रश्मि को बुलिंग का सामना करना पड़ता है पर अपने लक्ष्य पर कार्यरत रश्मि इंडिया को तीन गोल्ड मेडल दिलाती है। एथलेटिक्स एसोसिएशन में बाकी खिलाड़ियों में कुछ रश्मि की इस उन्नत्ति को देख जलने लगती हैं और चालाकी से उसकी नकली रिपोर्ट बना देती हैं जिसके मुताबिक रश्मि लड़की नहीं बल्कि एक लड़का है। ये सब देख रश्मि खुद को काबू नहीं कर पाती और उसकी हाथापाई उन लड़कियों से हो जाती हवापिस शुरुवाती दृश्य को पेश किया गया है जब पुलिस वाले रश्मि को जीप में अपने ससथ ले जाते हैं। 


गगन पुलिस स्टेशन पहुंचता और उसे निकालता है। स्टेशन के बाहर निकलते ही मीडिया वहां एकत्रित होती है और उसे सवाल करती है कि "आप लड़की है या लड़का"? रश्मी को पता चलता है कि वह 6 घंटे जो उसके टेस्ट हुए थे उसकी रिपोर्ट में आया है कि, उसने ब्लड में अत्यधिक टेस्टोस्टेरोन (हाईपरऐंडोजेनिज़्म) पाया गया है। इशित देसाई(अभिषेक बैनर्जी) वकील रश्मि के साथ मिल एसोसिएशन पर केस दर्ज कर देते हैं।

 

फिल्म का सबसे संवेदनशील भाग तब आता है जब केस के ४ माह बाद रश्मि को पता चलता है कि वह प्रेग्नेंट है। वकील इस बात उसे कोर्ट में बताने को बोलता है,जिससे रश्मि यह कहते हुए मना कर देती है कि "क्यूंकी मैं मां बनने वाली हूं, तो साबित होता है कि मैं लड़की हूं पर जो खिलाड़ी मां नहीं बनती है उनका क्या होगा? " फिल्म के इस भाग ने महिलाओं की उस आवाज को बुलंद करने का कार्य किया है जिसे अमूमन अनदेखा कर दिया जाता है। 

काफी सबूतों गवाहों से पूछताछ करने पर पता चलता है कि इन सब के पीछे एसोसिएशन अधिकारी और उसकी बेटी का हाथ है जो रश्मि की कामयाबी से जलते थे। जिस पर फैसला सुनाते हुए जज लिंग परीक्षण को गलत बताती हैं और रश्मि को आगे दौड़ने के लिए योग्य मानती हैं। 

इस बार जापान में हुए ओलिंपिक खेलों में हमने महिलाओं का दम-ख़म देखा ही है जिन्हे केवल जरुरत है प्रोत्साहन की।ऐसे में यह फिल्म एक बड़ा योगदान है महिलाओं के सशक्तिकरण में। 






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