मनोज बाजपेयी, कुछ पाने की ज़िद | ज़मीन के संघर्षों से आसमान तक उड़ने की हैरतअंगेज़ कहानी's image
Book ReviewArticle4 min read

मनोज बाजपेयी, कुछ पाने की ज़िद | ज़मीन के संघर्षों से आसमान तक उड़ने की हैरतअंगेज़ कहानी

Kavishala ReviewsKavishala Reviews March 25, 2022
Share0 Bookmarks 731 Reads2 Likes

ज़मीन के संघर्षों से आसमान तक उड़ने की हैरतअंगेज़ कहानी! हिंदी सिनेमा और मनोज वाजपेई के आर्ट को पसंद करने वाले हर सिनेमाप्रेमी के लिए ये किताब जरूरी है। मनोज बाजपेयी के जीवन के अलग अलग पड़ाव और अनछुए पहलू शानदार किस्सागोई में पिरोए गए हैं। सोने पर सुहागा ये कि पीयूष पांडेय ने अपने पत्रकारिता के अनुभव का भरपूर इस्तेमाल करते हुए मनोज वाजपेई के जीवन को सिर्फ एक अभिनेता तक लिमिट नहीं किया है.. बल्कि बिहार से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई और मुंबई से इंटरनेशनल मंच तक अपना नाम बनाने के मनोज वाजपेई के संघर्ष को एक आम इंसान से जोड़ा है। कोई हैरानी की बात नहीं अगर भविष्य में इस किताब पर फिल्म या वेबसीरीज बनती हुई दिखाई दे। इस बायोग्राफी की एक खास बात मुझे वो तस्वीरें भी लगी जो मनोज वाजपेयी के पुराने दिनों की हैं.. जो इससे पहले कहीं और नहीं दिखी.. खासतौर पर उनका पुश्तैनी घर, परिवार से साथ बिताए पल और यारों के साथ शूटिंग के हंसी-ठिठोली वाले पल। भाषा, कहानी का फ्लो और रिसर्च के आधार पर ये आगे लिखी जाने वाली बायोग्राफीज़ के लिए नया बेंचमार्क साबित होगी।
अमेजन से एक पाठक का रिव्यू



मनोज बाजपेयी, कुछ पाने की ज़िद:मनोज बाजपेयी नए जमाने के गिनेचुने कलाकारों में से हैं जिन्होंने कम उम्र में ही हिंदी सिनेमा में एक बड़ा कद हासिल कर लिया था। दिग्गज कलाकार और फिल्म समीक्षक उनके अभिनय का लोहा मानते हैं। दर्शक उनके नाम पर थियेटर जाते हैं और वे जानते हैं कि बाजपेयी सिर्फ अपने मन की फिल्में करते हैं। मनोज बाजपेयी की यह जीवनी अभिनय को लेकर उनके ज़िद और जुनून की कहानी है जिसमें पाठकों को कई नई बातें पता लगेंगी, मसलन-- बाजपेयी के पिता भी पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट में ऑडिशन का टेस्ट देने गए थे, उनके पूर्वज अंग्रेजी राज के एक दमनकारी किसान कानून की वजह से उत्तर प्रदेश के रायबरेली से चंपारण आए थे और ये भी कि मनोज बाजपेयी का बचपन उस गाँव में बीता है जहाँ महात्मा गांधी ने अपने प्रसिद्ध चंपारण सत्याग्रह के दौरान एक रात्रि विश्राम किया था और फिल्म सत्या के भीखू म्हात्रे का चरित्र मनोज के गृहनगर बेतिया के एक शख्स से प्रेरित था, वगैरह-वगैरह। मनोज बाजेपेयी की यह जीवनी वरिष्ठ टीवी पत्रकार पियूष पांडे ने लिखी है जो उनसे एक दशक से ज़्यादा से जुड़े रहे हैं और ऐसी घटनाओं और किस्सों के गवाह हैं जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं। मनोज बाजपेयी और उनके सिनेमाई सफ़र को जानने के लिए यह एक ज़रूरी पुस्तक है।

पीयूष पांडे: पियूष पांडेय वरिष्ठ पत्रकार हैं और फिलहाल टाइम्स नाऊ नवभारत में बतौर सीनियर एडिटर काम करते हैं! उन्होंने आजतक, एबीपी न्यूज़ और जी न्यूज़ समेत कई मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर काम किया है! इससे पहले उनकी तीन पुस्तकें छिछोरेबाजी का रिजॉल्यूशन, धंधे मातरम, और कबीरा बैठा डिबेट में प्रकाशित हो चुकी हैं! उन्होंने स्टार प्लस के सीरियल महाराजा की जय हो के संवाद भी लिखे हैं और वह फिल्म ब्लू माउंटेंस के एसोसिएट डायरेक्टर भी रह चुके हैं! साल 2008 में अभिनेता मनोज बाजपेयी ने पियूष पांडेय द्वारा निर्मित ब्लागिंग प्लेटफार्म पर अपना ब्लॉग आरम्भ किया था और उन्ही दिनों से लेखक का उनसे परिचय है! .

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts