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रचनाकार रघुपति सहाय का फ़िराक़ गोरखपुरी बनने तक का सफ़र |

Kavishala LabsKavishala Labs August 28, 2021
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यूं माना ज़िंदग़ी है चार दिन की

बहुत होते हैं यारों चार दिन भी

ख़ुदा को पा गया वायज़ मगर है

ज़रूरत आदमी को आदमी की



-फ़िराक़ गोरखपुरी


रामकृष्ण की कहानियों से शुरूआत करने वाले, उर्दू भाषा के प्रख्यात रचनाकार रघुपति सहाय फ़िराक जो अपने शायरी के उपनाम "फ़िराक़ गोरखपुरी" से जाने जाते हैं।इनका जन्म 28 अगस्त 1896 गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में कायस्थ परिवार में हुआ था।


प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

अपनी प्राथमिक शिक्षा उन्होंने रामकृष्ण की कहानियों के जरिए शुरू की थी।फ़िराक़ को बचपन से रामायण के किस्से,सूरदास और मीरा के लिखे हुए काव्य बहुत पसंद थे।जिसके बाद उन्होंने अरबी, फारसी और अंग्रेजी भाषा का गहन अध्ययन किया।29 जून 1914 को उनका विवाह प्रसिद्ध जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ था। वे पूर्व प्रधानमत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के एक अच्छे दोस्त थे। 

आपको बता दे फ़िराक़ ने कला के क्षेत्र में स्नातक की डिग्री हासिल की तथा उन्होंने इसमें पूरे देश के अंदर चौथा स्थान प्राप्त किया । बचपन से ही पढा़ई के प्रति उनका बहुत झुकाव था। वे 1919 में सिविल सेवा के लिए नामांकित हुए।परन्तु उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि अन्य क्रांतिकारियों की तरह उन्हें भी ब्रिटिश राज मे नौकरी करना स्वीकार नहीं था। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वतंत्रता के आंदोलन में पूरी तरह से शामिल होने का फैसला किया । 

जिसके बाद उन्होंने कई आंदोलनों में भाग लिया, इसके चलते 1920 में उन्हें जेल भी हुई थी ।1922 में अपनी रिहाई के बाद, उन्होंने सचिव के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में काम भी किया।

1959 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 40 वर्ष अपने अध्यापन के कार्य के बाद सेवानिवृत्त हुए।


साहित्य

उन्होंने 60 वर्ष तक अपना काव्य लेखन किया जिसमें 40,000 से अधिक दोहे लिखे हैं ।उन्हें आधुनिक उर्दू दुनिया में सबसे प्रमुख व्यक्ति के रूप में स्थान दिया गया है। उनके समकालीनों में अल्लामा इकबाल, फैज अहमद फैज, कैफी आजमी और साहिर लुधियानवी जैसे प्रसिद्ध उर्दू कवि शामिल थे । फिराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। फ़ारसी, हिन्दी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ होने के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रच-बस गई है। उनके द्वारा लिखे ग़ज़ल आज भी प्रसिद्ध हैं। 


उनकी रचनाएँ

शायरी 

गुल-ए-नगमा, मश्अल, रूह-ए-कायनात, नग्म-ए-साज, ग़ज़लिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, रम्ज व कायनात, चिरागां, शोअला व साज, हजार दास्तान, बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधीरात, परछाइयाँ और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचना फ़िराक़ साहब ने की है।

उपन्यास

साधु और कुटिया


सम्मान एवं पुरस्कार

उर्दू में उनके द्वारा दिये योगदान के लिए उन्हें कई उल्लेखनीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। 

उन्हें 1960 गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादेमी अवार्ड (उर्दू) से सम्मानित किया गया है ।1969 में ज्ञानपीठ अवार्ड दिया गया। फ़िराक़ गोरखपुरी को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में 1967 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था । इसके साथ-साथ उन्हें कई अन्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।


लंबी समय से बीमार रहने के बाद 3 मार्च 1982 को नई दिल्ली में उन्होंने आखिरी सांस ली, और दुनिया को अलविदा कह गए।आज ये महान शायर हमारे बीच नहीं हैं पर इनकी सभी रचनाएँ गज़लें, नज़्मे तथा शायरी को सहेज कर हमारे दिलों में रखा गया है जो उर्दू शायरी को पसंद करने वालों को उनकी कमी महसूस नहीं होने देती।


प्रस्तुत है फ़िराक़ गोरखपुरी की कुछ प्रसिद्ध शायरियाँ:


{1} बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं

तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते है


{2} रात भी नींद भी कहानी भी

हाए क्या चीज़ है जवानी भी


{3} बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की

सौ बात बन गई है 'फ़िराक़' एक बात की


{4} बस इतने पर हमें सब लोग दीवाना समझते हैं

कि इस दुनिया को हम इक दूसरी दुनिया समझते हैं


{5} यही जगत की रीत है, यही जगत की नीत

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत


फ़िराक़ गोरखपुरी की एक सुप्रसिद्ध ग़ज़ल:



आँखों में जो बात हो गई है 

इक शरह-ए-हयात हो गई है 

जब दिल की वफ़ात हो गई है 

हर चीज़ की रात हो गई है 

ग़म से छुट कर ये ग़म है मुझ को 

क्यूँ ग़म से नजात हो गई है 

मुद्दत से ख़बर मिली न दिल की 

शायद कोई बात हो गई है 

जिस शय पे नज़र पड़ी है तेरी 

तस्वीर-ए-हयात हो गई है 

अब हो मुझे देखिए कहाँ सुब्ह 

उन ज़ुल्फ़ों में रात हो गई है 

दिल में तुझ से थी जो शिकायत 

अब ग़म के निकात हो गई है 

इक़रार-ए-गुनाह-ए-इश्क़ सुन लो 

मुझ से इक बात हो गई है 

जो चीज़ भी मुझ को हाथ आई 

तेरी सौग़ात हो गई है 

क्या जानिए मौत पहले क्या थी 

अब मेरी हयात हो गई है 

घटते घटते तिरी इनायत 

मेरी औक़ात हो गई है 

उस चश्म-ए-सियह की याद यकसर 

शाम-ए-ज़ुल्मात हो गई है 

इस दौर में ज़िंदगी बशर की 

बीमार की रात हो गई है 

जीती हुई बाज़ी-ए-मोहब्बत 

खेला हूँ तो मात हो गई है 

मिटने लगीं ज़िंदगी की क़द्रें 

जब ग़म से नजात हो गई है 

वो चाहें तो वक़्त भी बदल जाए 

जब आए हैं रात हो गई है 

दुनिया है कितनी बे-ठिकाना 

आशिक़ की बरात हो गई है 

पहले वो निगाह इक किरन थी 

अब बर्क़-सिफ़ात हो गई है 

जिस चीज़ को छू दिया है तू ने 

इक बर्ग-ए-नबात हो गई है 

इक्का-दुक्का सदा-ए-ज़ंजीर 

ज़िंदाँ में रात हो गई है 

एक एक सिफ़त 'फ़िराक़' उस की 

देखा है तो ज़ात हो गई है! 


  • फ़िराक़ गोरखपुरी
























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