किसान का दर्द : मिली सजा मुझे धरती का सीना चीरने की, के आज किसी को सुनाई नहीं दे रही, आवाज मेरे दर्द भरे सीने की।'s image
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किसान का दर्द : मिली सजा मुझे धरती का सीना चीरने की, के आज किसी को सुनाई नहीं दे रही, आवाज मेरे दर्द भरे सीने की।

Kavishala LabsKavishala Labs October 9, 2021
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किसान का दर्द : 

मिली सजा मुझे धरती का सीना चीरने की, 

के आज किसी को सुनाई नहीं दे रही, 

आवाज मेरे दर्द भरे सीने की।

"देखता हूं नित दिन में एक इंसान को,

धूप में जलता हुआ शिशिर में पिसता हुआ

वस्त्र है फटे हुए पांव है जले हुए,

पेट-पीठ एक है बिना हेल्प जोन गए हुए।

खड़ी फसल जल रही,

सूद ब्याज बढ़ रही,

पुत्र प्यासा रो रहा दूध के इंतजार में।

कष्ट में वह पूछता है,

कर्मफल कब पाऊंगा?

या यूं ही संघर्ष करता

परलोक सिधार जाऊंगा?"

- राकेश धर द्विवेदी

कवी हमें इस कविता के जरिए यह कहना चाहता है, कि एक इंसान - जो है किसान, फटे हाल, नंगे पैर, रोज तीन पहर जलता है, बिना किसी स्वास्थ्य चेकअप के। जिस की फसल तो खड़ी जलती रहती है, ना उचित दाम मिलता है, कर्ज चढ़ता रहता है, भूखा मरने की नौबत आ जाती है। अब वह पूछ रहा है, कि मेरी मेहनत की सही कीमत कब मिलेगी? या यूं ही मैं भूखा मर जाऊंगा?


लाखों किसानों की हालत इतनी खराब हो चुकी है, कि वह भारी कर्ज में डूबे हुए हैं और किसान जो सिर्फ प्रकृति के ऊपर निर्भर है उसकी फसल वर्षा, धूप, मौसम की मार से नहीं फलती। ऐसे में "डॉ सुदेश यादव" की कविता में जिसे किसान को भगवान का दर्जा दिया गया है लिखते हैं :

"तू ही पैदा करता है अन्न, 

 नहीं मिलता पूरा धन,

 ढक पाए तू न तन,

 तेरे घर न नीवाला है,

 हमपे तेरे एहसान हैं,

 तू है कितना महान,

 तुझे कह दूं भगवान,

 तूने सबको ही पाला है।"

पर अपने आप को भगवान ना बताते हुए किसान रोते हुए बोलता है कि :

"मैं किसान हूं, मेरा हाल क्या?

मैं तो आसमां की दया पे हूं,

कभी मौसमों ने हंसा दिया,

तो कभी मौसमों ने रुला दिया।

मौसम की आपदा से किसान टूट तो गया ही था। रही सही, कसर अनाज का सही मूल्य ना मिलना बन गया।


"कर्ज़ एक ऐसे मेहमान की तरह घर में घुसता है,

कि जिसे बुलाना नहीं चाहते, पर स्वागत करना पड़ता है। आवभगत किश्तों के रूप में करनी पड़ती है, 

पर वह जाता नहीं वही बसने लगता है,

और, आस्तीन का सांप बन उसी किसान को डसने लगता है।

कर्ज खत्म नहीं हो रहा,

दाम अनाज के मिल नहीं रहे,

सरकार अपना खेल-खेल रही है।

व्यापारी अपनी तिजोरी भर रहे हैं,

किसान की हालत यह हो गई है,

कि अपने ही कत्ल कि उसे फांसी हो गई है।

- कवित्री ज्योति शर्मा 


हर रोज अखबारों में किसानों की आत्महत्या करने की खबरें मिल रही है। जो व्यक्ति हमें भरपेट खाना उपलब्ध कराता है आज वही मौत को गले लगा रहा है। 'अंशुमन शर्मा सिद्धप' ने "एक किसान" शीर्षक से कविता लिखी है वह पूरी मानवता पर प्रश्न खड़ा करता है :

"दो दिनों से कुछ खाए बिना, वो भूखा सोया था।

फसलों को अपनी देखकर, वह खूब रोया था।

रहमत की भीख मांगी थी उसने, पर वक्त बहुत हो चला था।

दो दिन बाद घर नीलाम होना था, वो एक दिन पहले छोड़ चला था।

खाकर जहर भी जब न मौत आई, वो फांसी लगाकर लटक गया।

दूसरे दिन अखबार में छपा, एक और किसान सटक गया।।"


सरकारों, पूंजीपतियों की उपेक्षा और अमानवीयता के कारण किसानों का अपने पैरों पर खड़ा हो पाना मुश्किल नजर आ रहा है। किसान और उसके परिवार की व्यथा कौन सुने, हमारे नसों में फिर भी कुछ जज्बा उठ जाता है। परन्तु, नेताओं को कुछ नहीं होता। सरकार का पूंजीपतियों के प्रति मोह और किसानों के प्रति रूखा व्यवहार दुख पहुंचाता है। सरकार की नीतियों से परेशान हो चुका है किसान।

"किसान का दर्द" शीर्षक कविता में नीरज चौहान लिखते हैं :-

"व्यवस्था का जुल्मो-सितम,

कुदरत का कहर पी रहा,

देखो मेरा अन्नदाता,

खुद जहर पी रहा।

बिलखती है खामोशी,

चीखता है सन्नाटा,

पालनकर्ता मांग रहा है,

दो रोटी का आटा।

अनब्याही बेटी ने,

दर्द शूल सा दिया है,

वह आज उसकी चुनरी से,

पंखे पर झूल गया है।।"

अतः 

हम यही कह सकते हैं कि बहुत गीत बने, 

बहुत लेख छपे, कि मैं बड़ा महान हूं। 

पर दुर्दशा ना देखी मेरी किसी ने, ऐसा मैं किसान हूं।

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