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भयानक रस : भय की अभिव्यक्ति के भाव को व्यक्त करने वाला रस

Kavishala LabsKavishala Labs October 27, 2021
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भयानक रस परिभाषा — भयप्रद वस्तु या घटना देखने सुनने अथवा प्रबल शत्रु के विद्रोह आदि से भय का संचार होता है। यही भय स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों में परिपुष्ट होकर आस्वाद्य हो जाता है तो वहाँ भयानक रस होता है।

उदाहरण -

"एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय।

विकल बटोही बीच ही, परयों मूरछा खाय।।"

यहाँ पथिक के एक ओर अजगर और दूसरी ओर सिंह की उपस्थिति से वह भय के मारे मूर्छित हो गया है। यहाँ भय स्थायी भाव, यात्री आश्रय, अजगर और सिंह आलम्बन, अजगर और सिंह की भयावह आकृतियाँ और उनकी चेष्टाएँ उद्दीपन, यात्री को मूर्छा आना अनुभाव और आवेग, निर्वेद, दैन्य, शंका, व्याधि, त्रास, अपस्मार आदि संचारी भाव हैं, अत: यहाँ भयानक रस है।

निम्न लिखित कुछ कविताएं भयानक रस के उधारण है :-

(i) "डायन सरकार"

डायन है सरकार फिरंगी, चबा रही हैं दाँतों से, 

छीन-गरीबों के मुँह का है, कौर दुरंगी घातों से ।

हरियाली में आग लगी है, नदी-नदी है खौल उठी,

भीग सपूतों के लहू से अब धरती है बोल उठी,

इस झूठे सौदागर का यह काला चोर-बाज़ार उठे,

परदेशी का राज न हो बस यही एक हुंकार उठे ।।

— रांगेय राघव

व्याख्या : यहां कवि कहता है कि, फिरंगी सरकार डायन बनकर हम सब को चबा रही है। गरीबों से रोटी का टुकड़ा छीन रही है। खेतों में आग लग गई है। नदी भी खौलने लगी है। अपने बच्चों के खून से धरती भी बोल उठी है कि, झूठे सौदागर का यह काला बाजार यहां से चला जाए। हर तरफ यही आवाज है कि, परदेसी लोगों का यहां राज ना हो।

(ii) "अपनी असुरक्षा से"

देश की सुरक्षा यही होती है

कि बिना जमीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए

आँख की पुतली में हाँ के सिवाय कोई भी शब्द

अश्लील हो

और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे

तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़

जिसमें उमस नहीं होती

आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है

गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है

और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम

हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा

हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफ़ा

लेकिन गर देश

आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है

गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है

तो हमें उससे ख़तरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है

कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह

टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे

क़ीमतों की बेशर्म हँसी

कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो

तो हमें अमन से ख़तरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा

कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी

कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा

अक़्ल, हुक्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी

तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।

— पाश

व्याख्या : कवि कहता है इस देश की सुरक्षा यही रह गई है कि, बिना जमीर के जीना शर्त बन गई है। हम देश को घर जैसी पवित्र जगह समझते थे। अब उसमें वह बात नहीं रही। देश एक एहसास था। कुर्बानी वाली वफा समझते थे। परंतु देश उल्लू बनाने की प्रयोगशाला बन गया है। देश की शांति कर्ज के पहाड़ों से गिरते हुए पर पत्थरों की तरह हो गई है। तनख्वाओ के मुंह पर महंगाई की हंसी उड़ती है। देश की सुरक्षा को कुचलकर अमन का रंग चढ़ेगा। कला का फूल सिर्फ राजाओं के महलों में ही खिलेगा। हमें तो अब देश की सुरक्षा से खतरा है।

(iii) "कैदी और कोकिला" की कुछ पंक्तियां 

क्या गाती हो?

क्यों रह-रह जाती हो?

कोकिल बोलो तो!

क्या लाती हो?

सन्देशा किसका है?

कोकिल बोलो तो!

ऊँची काली दीवारों के घेरे में,

डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,

जीने को देते नहीं पेट भर खाना,

मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना!

जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,

शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?

हिमकर निराश कर चला रात भी काली,

इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली ?

क्यों हूक पड़ी?

वेदना-बोझ वाली-सी;

कोकिल बोलो तो!

"क्या लुटा?

मृदुल वैभव की रखवाली सी;

कोकिल बोलो तो।"

बन्दी सोते हैं, है घर-घर श्वासों का

दिन के दुख का रोना है निश्वासों का,

अथवा स्वर है लोहे के दरवाजों का,

बूटों का, या सन्त्री की आवाजों का,

या गिनने वाले करते हाहाकार।

सारी रातें है-एक, दो, तीन, चार-!

मेरे आँसू की भरीं उभय जब प्याली,

बेसुरा! मधुर क्यों गाने आई आली?

क्या हुई बावली?

अर्द्ध रात्रि को चीखी,

कोकिल बोलो तो!

किस दावानल की

ज्वालाएँ हैं दीखीं?

कोकिल बोलो तो!

तुझे मिली हरियाली डाली,

मुझे नसीब कोठरी काली!

तेरा नभ भर में संचार

मेरा दस फुट का संसार!

तेरे गीत कहावें वाह,

रोना भी है मुझे गुनाह!

देख विषमता तेरी मेरी,

बजा रही तिस पर रण-भेरी!

इस हुंकृति पर,

अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?

कोकिल बोलो तो!

मोहन के व्रत पर,

प्राणों का आसव किसमें भर दूँ!

कोकिल बोलो तो!

फिर कुहू!---अरे क्या बन्द न होगा गाना?

इस अंधकार में मधुराई दफनाना?

नभ सीख चुका है कमजोरों को खाना,

क्यों बना रही अपने को उसका दाना?

फिर भी कस्र्णा-गाहक बन्दी सोते हैं,

स्वप्नों में स्मृतियों की श्वासें धोते हैं!

इन लोह-सीखचों की कठोर पाशों में

क्या भर देगी? बोलो निद्रित लाशों में?

क्या? घुस जायेगा स्र्दन

तुम्हारा नि:श्वासों के द्वारा,

कोकिल बोलो तो!

और सवेरे हो जायेगा

उलट-पुलट जग सारा,

कोकिल बोलो तो!

— माखनलाल चतुर्वेदी

व्याख्या : इसमें कवि ब्रिटिश राज में एक कैदी और कोकिला पक्षी की वार्तालाप को दर्शाता है। इसमें कवि कहता है कि, कोकिला तुम आजाद हो! आसमान तुम्हारा घर है! तुम्हें कुछ भी करने, उड़ने की आजादी है। परंतु, यहां कैदियों को दस फुट की जगह ही संसार है। ऊंची काली दीवारों के पीछे डाकू, चोर हैं, या फिर आजादी के सेनानी यहां कैद है। यहां न तो खाना ढंग से मिलता है, न जीने दिया जाता है। हर तरफ सांसों की आवाज है, या फिर लोहे के दरवाजे की आवाज है। खनकती हुई हथकड़ियों का शोर है, यहां पहरा देते संतरी की आवाज या सिपाहियों के जूतों की आहट होती है। इस काली रात तुम, है! कोकिला - तुम क्यों रोती हो? क्या तुम्हें किसी दानव की या आग की ज्वालाए दिखी? या तुम किसी का कोई संदेश लेकर आई हो? या हम लोगों दयनीय दशा देखकर तुम्हारे आंखों से आंसू बह गए।

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