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जादुई जायिका मेरी नानी का - दिव्यांश पोद्दार

Kavishala InterviewsKavishala Interviews November 5, 2021
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किसी भी वेब सीरीज ,फिल्म या कोई भी डॉक्यूमेंट्री जो बनती है उसके पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है वो है स्क्रिप्ट वास्तव में हर चीज़ लिखी हुई चीज़ों से ही शुरू होती है। इसलिए हमे लगता है कि हमे एक मौलिक रूप से काम करना चाहिए और जब मौलिकता की बात हो तो किताब सबसे बड़ा सहारा है।

-सुशील पोद्दार


शोर में शोर मचाना है या हकीकत को जानना है इन दो विकल्पों में जरुरी है सही विकल्प का चयन और सही विकल्प के चयन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हैं किताबें , क्यूंकि किताब ही एक ऐसा माध्यम हैं जो सत्य उजागर कर सकता है जरुरी है किताबे पढ़ना इसके साथ-साथ उसके पीछे की कहानियों को जानना। इसी उद्देश्य को साथ लिए कविशाला ने शुरू किया है नया कार्यक्रम टॉकिंग बुक्स(Talking Books) यानी किताबें बोलती हैं। इस नई शुरुआत के पहले कार्यक्रम में कविशाला के साथ जुड़े IRS सुशील पोद्दार और निधि पोद्दार जिन्होंने मिल कर किताब लिखी है जिसका नाम है BLAZE - A SON’S TRIAL BY FIRE ये किताब उनके पुत्र दिव्यांश के जीवन की वास्तविक कहानी पर आधारित है। अंग्रेजी में लिखी इस किताब में कई प्रेरणादायक कविताएं लिखी गई हैं जो जीवन में आए उतार-चढाव और संघर्ष को दर्शाती हैं । संस्थापक अंकुर मिश्रा द्वारा IRS सुशील पोद्दार और निधि  पोद्दार के साथ किए इस किताब के ऊपर विस्तार चर्चा को पढ़ते हैं।


सर दिव्यांश की कहानी को लोगों तक पहुँचाने के लिए आपने किताब का ही माध्यम क्यों चुना ये सवाल इसलिए क्यूंकि आज के दौर में जहाँ विडिओ फॉर्मेटिंग या वेब सीरीज हैं जिसके माध्यम से भी आप दिव्यांश की इस प्रेरणादायक कहानी को लोगो तक पहुंचा सकते थे ऐसे में इन सबके ऊपर किताबों को चुनने का कारण ?

 

सुशील पोद्दार : ये सवाल बिल्कुल लाज़्मी है कि विडिओ फॉर्मेटिंग का जरिया न लेकर किताबों को क्यों चुना वास्तव में इसका आधार दिव्यांश ही था। दिव्यांश खुद लिखने-पढ़ने वाला व्यक्ति था जीवन में संघर्ष करते हुए जितनी भी चुनौतियां उसके जीवन में आई उनको लिखना शुरू किया कविताएं और लेख लिखें कई ऐसी बातों को उसने लिखा जो हम आम लोगो की जिंदगी से जुड़ी थी मैं मानता हूँ कहानियों को किताब के रूप में ही लिखी जाए इस बात का संकेत दिव्यांश ने ही दिया था। एक अभिवाक होने के नाते हमे ये लगता था उसके इस भाव और मंशा का हमे सम्मान करना चाहिए तो यही कारण था कि हमने किताब के रूप में कहानी को लिखा। किताब के रूप में कहानी लिखना एक संयोग की तरह था आप कह सकते हैं कि हम एक आकस्मिक लेखक हैं। दिव्यांश ने कई ऐसी कहानियां लिखी जो हमे लगा मैं मानता हूँ किसी भी वेब सीरीज ,फिल्म या कोई भी डॉक्यूमेंट्री जो बनती है उसके पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है वो है स्क्रिप्ट वास्तव में हर चीज़ लिखी हुई चीज़ों से ही शुरू होती है। इसलिए हमे लगता है कि हमे एक मौलिक रूप से काम करना चाहिए और जब मौलिकता की बात हो तो किताब सबसे बड़ा सहारा है। लोगो तक पहुंचनी चाहिए। मैं मानता हूँ किसी भी वेब सीरीज ,फिल्म या कोई भी डॉक्यूमेंट्री जो बनती है उसके पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है वो है स्क्रिप्ट वास्तव में हर चीज़ लिखी हुई चीज़ों से ही शुरू होती है। इसलिए हमे लगता है कि हमे एक मौलिक रूप से काम करना चाहिए और जब मौलिकता की बात हो तो किताब सबसे बड़ा सहारा है। 


जिन लोगो ने अभी तक ये किताब नहीं पढ़ी हैं उन लोगो को एक पाठक के तौर पर ये किताब क्यों पढ़नी चाहिए ?


सुशील पोद्दार :किताब लिखने से पहले मेरे मन में भी यही प्रश्न था कि किताब लिखी जानी चाहिए या नहीं लिखी जानी चाहिए? और अगर लिखी जानी चाहिए तो दूसरा प्रश्न यह कि मैं अपने पाठकों को किताब के जरिये क्या देता हूँ ? ये दो प्रश्न सबसे पहले मेरे अंदर जगे। हम सभी किसी न किसी चुनौती से घिरे हैं आपके जीवन की अपनी समस्याएं हैं हमारी अपनी समस्याएं हैं बाक़िओं की अपनी , अब प्रश्न ये है कि उन समस्याओं से कैसे निपटा जाए। क्या जिस चुनौती का आप सामना कर रहे हैं वो आपको आपके अंदर कोई प्रतिभा ढूंढने में मददगार है ? आज हमारे समाज में कैंसर का एक रूढ़िबद्ध प्रारूप विकसित हो चूका है। लोगो को लगता है कैंसर हुआ है ठीक है इलाज़ होगा और अंत। लोगो को लगता है अंत हो जाएगा पर ये केवल एक मानसिकता है कैंसर होने से लेकर मौत के बिच में एक बहुत बड़ा जीवन काल होता है और उस जीवन काल में अपने आपको अपने अंदर तलाशना और तराशना होता है। ये किताब इसी चीज़ को बताता है कि जब आप किसी समस्या या कैंसर जैसी बिमारी से जूझते हैं आपके लिए जरुरी है उस समय में अपने आप को ढूंढ़ने की और तब आप अपने आप में एक नई प्रतिभा का संचालन कर सकेंगे तो यह किताब इसलिए पढ़ना चाहिए। ये किताब अगर देखा जाए तो डॉक्टर को भी पढ़ना चाहिए मुझे कई डॉक्टर्स ने मैसेज किए हैं और कहा है कि मैं इस किताब को जीवन भर जब तक इस कार्य में हूँ अपने साथ रखूँगा। 


निधि पोद्दार:जब हम यह किताब लिख रहे थे तो यही हमारे मन में आता था कि ऐसा क्या लिखें जो लोग पढ़ना चाहें। कहानी लिखने से पहले मैं जैसी थी और कहानी लिखने के बाद मैं जो हूँ उसमे बहुत बड़ा अंतर है एक सकारात्मकता मैं अपने अंदर देखती हूँ। जिंदगी को देखने का तरीका मेरा बदला है मुझे लगता है कि अगर मैं बदल सकती हूँ तो हाँ कई लोगों को दिव्यांश की यह कहानी लाभ पहुंचा सकती हैं।


मैम , एक अभिवावक होने के नाते शायद आपसे ज़्यादा ये दर्द अपने को खोने का कोई नहीं समझ सकता ऐसे में आपने इस कहानी को लिखा है जिस तरीके से कहानी है उसी तरीके से लोगो के सामने रखा है। कहानी लिखने वक़्त उस दौरान हुई सभी घटनाओं को याद किया होगा उस स्थिति में आपने कैसे अपने आपको इतनी मजबूती से रखा कि कहानी जैसी थी वैसी ही लोगो तक पहुँच पाए ?


निधि पोद्दार: सबसे पहले तो एक माँ के रूप में मुझे ऐसा लागता था कि हाँ अगर किसी माँ का बच्चा चला जाए तो उससे ज़्यादा पीड़ादायक शायद कुछ और नहीं हो सकता ऐसे में मुझे लगा कि मैं कैसे उसे अपने पास रखूं कि लोगो को लगे वो कहीं गया नहीं है और वो और उसका किया काम मेरे पास ही है। एक ज़िद्द और विश्वास था कि जैसा वो छोड़ गया है जैसी जिंदगी थी उसकी और जो भी उसने लिखा वो मैं सामने लाऊँ ये किताब मेरा सपना था और जो सपना देखा उसे कैसे भी करने पूरा करना ही था तो वही एक चीज़ मुझे मजबूती देती थी। हांलाकि हाँ वो सब पुराणी चीज़ों को याद करना बहुत दर्द देता था पर वास्तव में वही एक हौसला भी देती थी जिससे ये किताब बनी जिससे लोग जुड़ाव महसूस करते है।


इस किताब में दिव्यांश की एक कविता है rebirth नाम की। सर ,इस कविता के पीछे की कहानी क्या थी ?

सुशील पोडार :Rebirth का अर्थ है पुर्नजन्म हमारे यहाँ ८४ योनिओं की बात की जाती है पर क्या सच में पुर्नजन्म के लिए ८४ योनिओं की जरुरत है क्या आपके वर्तमान जीवन में पुर्नजन्म नहीं हो सकता है ? यह कविता इसी बात को बताती है। ब्लड कैंसर की बिमारी में एक बहुत बड़ा इलाज होता है बोन-मेरो ट्रांसप्लांट जब दिव्यांश का यह ट्रीटमेंट हुआ जो सफल भी रहा। दिव्यांश को लगा की हाँ ६ साल इस बिमारी से जूझने के बाद उसका rebirth यानी पूर्णजन्म हुआ है और इस कविता को उसने तब लिखा था।सर आप अपने बचपन से लेकर अब तक की अपनी यात्रा के बारे में कुछ बतायें।


सुशील पोद्दार :मेरा बचपन एक शिक्षित परिवार में बीता। पटना यूनिवर्सिटी में मेरे पिता जी एक प्रोफेसर थे। मेरे ५ भाई-बहन थे जिनमे मैं सबसे छोटा था। मेरी शिक्षा एक सरकारी विद्यालय में हुई। मैं पढ़ने में अच्छा था और इंजीनियर बना। जिसके बाद मैं प्रसाशनिक सेवा परीक्षा में सफल हुआ और सरकारी कार्यालय में कार्यरत हो गया। मैं आगे बढ़ता गया जैसे-जैसे मुझे रास्ता मिला पर आश्चर्य की बात ये है कि जब मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो मुझे महसूस हुआ कि वास्तव में मेरी अब तक की यात्रा में कोई विकास तो हुआ ही नहीं। जो विकास मेरे जीवन में हुआ दिव्यांश के आने के बाद जब उसके जीवन में कैंसर की बिमारी आई क्यूंकि जब वो इस बिमारी से लड़ रहा था तब सिर्फ उसकी उनत्ति नहीं हो रही थी बल्कि हमारी भी साथ-साथ हो रही थी। इस किताब में ये कहानी जो लिखी गयी है इसका सूत्रधार दिव्यांश है लेकिन अगर इस कहानी को हम दोनों लिख पाएं हैं तो उसका सारा श्रेय दिव्यांश को ही जाता है। उसने हमे प्रेरणा दी जो हम इस कहानी को लोगो तक पहुंचा सकें

सर इस किताब में कई कविताएं हैं ऐसे में इस किताब को आपने केवल एक कविता संग्रह के रूप में क्यों नहीं रखा ?

सुशील पोद्दार :जब मैंने २१ कविताओं को तिथि की श्रृंखला के अनुसार लगाया तो मैंने देखा की दिव्यांश ने वास्तव में अपनी ऑटोबायोग्राफी कविताओं के माध्यम से लिखी थी। हर कविता का अपना एक महत्त्व था। वो कविता उसने क्यों पुराणी चीज़ों को याद करना और उस कविता के पीछे की कहानी क्या थी उसको सामने लाना जरुरी था। मैं एक उदाहरण देता हूँ ये २०१४ की बात थी मैं और दिव्यांश ट्रीटमेंट से वापिस लौट रहे थे तब रास्ते में दिव्यांश ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए पूछा पापा अब कितना इलाज बाकी है? (How much treatment is left?) इस पर मैंने उसे कहा dont bother we are half way through (इस पर ध्यान मत दो हम आधे रास्ते में हैं ) इसके बाद उसने मेरे से रास्ते भर कोई प्रश्न नहीं पूछे। मैं अपने दफ्तर चला गया और वो घर। रात को जब मैं वापिस आया तो मैंने देखा उसके चेहरे पर एक चमक थी दोपहर में उसे जिस उत्तर की तलाश थी उसे उसका उत्तर मिला जो उत्तर थी उसकी कविता half way down the path not untaken . उसने हाफ वे थ्रू वर्ड को उठाया और उस पर कविता लिख दी।अब मैं शायद सिर्फ इस कविता को लिखता तो उसकी पीछे की कहानी कैसे सामने ला पता। इस तरह की कई घटनाएं हुई दिव्यांश के जीवन में जिसे हमने इक्कठा किया और कहानी के साथ इसे लोगो तक पहुंचने की कोशिश की।







  

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