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कविशाला संवाद 2021 : हिंदी और भारतीय प्रशासनिक सेवा -जितेंद्र कुमार सोनी

Kavishala InterviewsKavishala Interviews October 5, 2021
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मैं व्यस्त हूँ परन्तु अस्त-व्यस्त नहीं

-जितेंद्र कुमार सोनी




देश के जाने माने आईएएस में विद्यमान आईएएस जो न केवल जनता के लिए जमीनी स्तर से कार्य करते हैं बल्कि उनकी हर समस्यायों को ख़त्म करना ही अपना लक्ष्य मानते हैं। जितेंद्र कुमार सोनी प्रशासनिक सेवा अधिकारी होने के साथ-साथ एक चर्चित लेखक भी हैं उनकी कई किताबें और काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही आपको बता दें वे एक अनुवादक भी हैं। 

कविशाला संवाद में हिंदी और भारतीय प्रशासनिक सेवा पर चर्चा के दौरान उन्होंने कई गंभीर मुद्दों पर अपनी बात रखी। 


सर ,जैसा की आप एक प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं आपकी तैनाती अलग -अलग जगहों पर होती होगी जहाँ से आपको नए अनुभव मिलते होंगे ,ये अनुभव कैसे सहायक हैं आपकी लेखनी में?


जवाब में सोनी जी बताते हैं नए लोगो से मिलते रहने से अनुभवों का दायरा बढ़ता है हम नए नए क्षेत्रों में कार्य करते हैं कई अनुभव मिलते हैं और निश्चित रूप से वही अनुभव शब्दों के रूप में अभिवयक्त भी होते हैं। दो लेखकों में फर्क बताते हुए वह कहते हैं एक लेखक जो एक जगह पर ही रहकर लिख रहा है वही दूसरा जो नयी नयी जगह पर जा रहा है उसके शब्दों में नवीनता होगी क्यूंकि वो जो लिख रहा है उसने उसे जमीनी रूप से महसूस किया है आगे बढ़ते हुए वो बताते हैं कि लेखक के लिए जरुरी है कि वो ठहरे नहीं क्यूंकि ठहराव पानी का हो या विचारों का वह अच्छा नहीं होता  लेखनी के लिए अनुभव जरुरी है


सर जहाँ आपके ऊपर इतनी बड़ी जिम्मेदारियां हैं जिन्हे आप कौशलता से पूरा करते हैं वही सर आप लेखनी भी करते हैं ,सर आप समय प्रबंधन कैसे करते हैं क्यूंकि लेखनी के लिए आवशयक हो जाता है समय निकलना

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए डॉ जितेंद्र कुमार सोनी कहते हैं की मैं वयस्त हूँ मगर असत-वयस्त नहीं। आगे वे लेखनी को एक प्रक्रिया बताते हैं जो एक बीज की तरह जनन होती है ,बताते हैं की जब भी उनके दिमाग में कुछ भी १ या २ पंक्ति भी आती है तो वे उसे अपने फ़ोन में लिख लेते हैं और बाद में उसे पूर्ण करते हैं। साथ ही जीतेन्द्र जी बताते हैं की लिखने के साथ पढ़ना भी उतना ही जरुरी हैं जब भी मुझे समय मिलता है तो मैं ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ने का प्रयास करता हूँ।


कोई भी साहित्य चाहे बात की जाए हिंदी साहित्य या अंग्रेजी साहित्य की प्रशासनिक सेवा में किस तरह किसी की मदद कर सकता है ?


इस पर जितेन्द्र जी बताते हैं कि कोई भी साहित्य किसी भी मनुष्य को संवेदनशील बनाने का कार्य करता है। आगे बढ़ते हुए वे संवेदनशीलता और भावुकता में अंतर बताते हुए कहते हैं कि संवेदनशीलता होती है जब हम कतार में लगे लोगो का दर्द समानभूत कर सकें। प्रशासनिक सेवा में संवेदनशीलता जरुरी है क्यूंकि वो वयक्ति जो संवेदनशील नहीं वो फाइल तो देख सकता है परन्तु फाइल के पीछे का चेहरा नहीं देख सकता। वयक्तिगत तोर पर मैं हमेशा साहित्य का ऋणी रहूँगा क्यूंकि साहित्य ने मुझे जमीन से जोर कर रखा। सबसे मुख्य बात वे कहते हैं कि साहित्य संवेदना जगाता है और संवेदना नवप्रकाशन शब्द की बुनियाद है


सर जब कोई छात्र upsc परीक्षा की तैयारी के लिए जाता है तो उसके समक्ष एक चयन आता है माध्यम चयन हिंदी माध्यम या अंग्रेजी माध्यम ,जैसा की आपने भी हिंदी माध्यम का चयन किया और आज के वक़्त में यह सुनने को मिलता है कि अंग्रेजी माध्यम की तुलना में हिंदी माध्यम कठिन है ,सर तो क्या ऐसा है या ये केवल एक मिथ्या मात्रा है ?

जितेन्द्र जी इस पर कहते हैं कि कोई भी छात्र जिसने २१-२२ वर्ष एक भाषा को बोला-समझा है उसके लिए सहज है उस भाषा में अपने बातों की प्रस्तुति करना उसके लिए उसे किसी भी तरह के बनावट के शब्दों की जरुरत नहीं पड़ती। अपनी भाषा में अपनी आप को वयक्त करना सबसे सरल और सहज है आपको शब्दों के रूपांतरण की आवश्यकता नहीं वही आप अपनी बात को सही ढंग से रख सकते हैं। किसी भी छात्र के लिए जरुरी है अपनी तैयारी को परीक्षा के मांग के अनुसार करना इसमें पहले से ही स्वयं को द्वयं दर्जे का मान लेना और ये सोच लेना की मेरा मध्याम यह है यह नहीं इससे आत्मविश्वास को प्रारम्भ से ही कम कर लेना यह सही नहीं। आवश्यक है आपने जो पढ़ा है उसे सामने लाएं। 


सर आज के दौर में हम देखते हैं कि हमारे युवा हिंदी को छोर विदेशी भाषा को अपना रहे हैं ,ऐसे में हिंदी के आने वाले भविष्य को आप किस रूप में देखते हैं ?


जिस पर वे बताते हैं कि किसी भी भाषा का भविष्य निर्भर है उसे बोलने वाले लोगो के ऊपर। वही अगर बात हो हिंदी की तो आज विश्व भर में कई लोग हिंदी बोलना और समझना चाहते हैं क्यूंकि उन्हें लगता है अगर उन्हें हमारे देश को जानना है तो जरुरी है हिंदी को समझना। आने वाले समय में हिंदी का प्रसार बढ़ने वाला है आगे बढ़ते हुए वे कहते हैं कि अगर मैं बात करूँ कविशाला कि तो इस मंच ने कई युवा को जो डायरी के पीछे लिखते थे उनको सीधा मंच दिया अभिवक्ति का। साथ ही कई संगठन कार्य कर रहे है हिंदी भाषा के प्रसार के लिए । मैं मानता हूँ आने वाले समय में हिंदी भाषा और साथ ही क्षेत्रिये भाषा का उज्जवल भविष्य है और साथ ही मानता हूँ कि कोई भी भाषा एक सभ्यता की पहचान होती है किसी भी भाषा का अंत उस सभ्यता का अंत है इसलिए जुवान को जिन्दा रखना भाषा को जिन्दा रखना है |



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