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शकील आज़मी 


मर के मिट्टी में मिलूंगा खाद हो जाऊंगा मैं 

फिर खिलूंगा शाख पर आबाद हो जाऊंगा मैं

बार-बार आऊंगा मैं तेरी नजर के सामने 

और फिर एक रोज तेरी याद हो जाऊंगा मैं

तेरे सीने में उतर आऊंगा चुपके से कभी 

फिर जुदा होकर तेरी फरियाद हो जाऊंगा मैं

अपनी जुल्फों को हवा के सामने मत खोलना 

वरना खुशबू की तरह आजाद हो जाऊंगा मैं


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