चित्रगुप्त पूजा, यमदित्या एवम् भईया दूज का आपस में संबंध's image
Article5 min read

चित्रगुप्त पूजा, यमदित्या एवम् भईया दूज का आपस में संबंध

Kavishala DailyKavishala Daily November 6, 2021
Share0 Bookmarks 187 Reads1 Likes

ओम चित्रगुप्ताय नमः

— चित्रगुप्त जी का मंत्र

भईया दूज के त्योहार को यमदित्या भी कहा जाता है। यमदित्या के दिन यमराज जी और चित्रगुप्त जी की पूजा की जाती है। 

चित्रगुप्त जी की जन्म कथा :-

ऐसा माना जाता है के, जब यमराज जी का जन्म हुआ तब उन्हें धर्मराज की पद प्रदान की गई थी। धर्मानुसार उन्हें जीवों को दण्ड देने का कार्य सौंपा गया था। और उनको अपने लिए एक लेखाकार सहयोगी की आवश्यकता हुई। धर्मराज की इस माँग पर ब्रह्मा जी समाधिस्थ हो गये और एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद जब वे समाधि से बाहर आए तो उन्होंने अपने समक्ष एक तेजस्वी पुरुष को खड़े पाया। जिसने उन्हें बताया कि, उन्हीं के शरीर से उसका जन्म हुआ है। तब ब्रह्मा जी ने उसे "चित्रगुप्त" नाम दिया। 

चित्रगुप्त जी "कायस्थ " कैसे कहलाए गए :-

क्योंकि इस पुरूष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था, इसीलिए ये "कायस्थ " कहलाये गए। कायस्थ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता अपने शरीर में स्थित। अपनी इन्द्रियों पर जिसका पूर्ण नियन्त्रण हो गया हो वह भी कायस्थ कहलाता है। 

साथ ही चित्रगुप्त का विवाह सूर्य की पुत्री यमी से हुआ था। इस तरह से चित्रगुप्त रिश्ते में यमराज के बहनोई हैं। यमराज और यमी भाई-बहन हैं और उन्हें सूर्य की जुड़वा संतान माना जाता है। यमी ने बाद में यमुना का रूप धारण कर लिया और वह धरती पर यमुना नदी के रूप में बहने लगीं।

चित्रगुप्त का यमराज जी की अदालत में महत्व :- 

भगवान चित्रगुप्त एक कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय प्राप्त होता है। आज के दिन धर्मराज यम और चित्रगुप्त की पूजा अर्चना करके उनसे अपने दुष्कर्मों के लिए क्षमा याचना का भी विधान है।

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक कहा जाता है कि, यमराज जी ने ब्रह्मा जी से ऐसा सहयोगी मांगा था, जो लेखन में तीव्र और कुशल हो। जिसकी नजर से कोई भी ना बच पाए और जो लंबे समय तक अपने स्थान पर स्थिर रहे। चित्रगुप्त जैसे सहयोगी को पाकर धर्मराज को जीवो को उनके किए की सजा देना आसान हुआ क्योंकि, जैसे कि लोग जाने-अनजाने में, भूल से, किसी के द्वारा, किसी के साथ, किसी के कहने पर या खुद से ही, अकेले में, मिलकर, कोई भी कर्म करते हैं तो उस कर्म का उसका कितना भाग था, कितनी उसकी इच्छा-अनिच्छा थी, इस सब का लेखा-जोखा चित्रगुप्त जी लिखते हैं। माना जाता है, हमारे शरीर के दोनों कंधों पर चित्रगुप्त विराजते हैं और जैसे-जैसे हम जो कर्म करते हैं उन सभी का लेखा-जोखा वह लिख लेते हैं। मृत्यु के पश्चात यमदूत या देवदूत जब हम सभी को धर्मराज के दरबार में लेकर जाते हैं, तब चित्रगुप्त अपने लेखे से हमारे कर्मों का लेखा-जोखा देखकर हमारे पाप-पुण्य का सारा विस्तार धर्मराज जी को बताते हैं। उस विस्तार के मुताबिक, धर्मराज जी प्राणी के पापो-पुण्यों का हिसाब-किताब देखकर स्वर्ग या नरक में भेजने का फैसला सुनाते हैं कि, कौन कितनी अवधि तक कहां रहेगा। अपने कर्मों का कितना फल भोगेगा, इसीलिए यम द्वितीया के दिन धर्मराज और चित्रगुप्त की और उनके कलम और दवात की पूजा की जाती है ताकि हमारे अनजाने में किए गए पापों का पश्चाताप कर सके। 

यमदित्या/भईया दूज कथा :-

चित्रगुप्त पूजा के दिन बहन के घर जाकर भोजन करने का खास महत्व है। ऐसा करने से भाई दीर्घायु होते हैं और उनकी परेशानियां खत्म होती हैं। इस दिन यमुना स्नान और पूजन का भी महत्व है।

यम द्वितीया नाम के पीछे एक और कथा भी है कि, समस्त चराचर को सत्य नियमों में आबद्ध करने वाले धर्मराज यम बहुत समय पश्चात अपनी बहन यमी से मिलने के लिए इसी दिन गए थे। यमी अपने भाई से मिलकर बहुत प्रसन्न हुई और उनकी ख़ूब आवभगत की। बहन के स्नेह से प्रसन्न यमराज ने बहन से वर माँगने के लिए कहा तो यमी ने दो वरदान माँगे – एक तो यह कि यह दिन भाई बहन के प्रेम के लिए विख्यात हो और दूसरा यह कि इस दिन जो भाई बहन यमुना के जल में स्नान करें वे आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाएँ। कहते हैं तभी से ये प्रथा चली कि कार्तिक शुक्ल द्वितीया को सभी भाई अपनी बहनों के घर जाकर टीका कराते हैं और अपनी दीर्घायु तथा सुख समृद्धि के लिए उनका आशीर्वाद लेते हैं।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts