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राम ने तोड़ा रावण का अहंकार, किया रामसेतु को पार !

Kavishala DailyKavishala Daily October 15, 2021
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रावण का करने वध,

किया रामसेतु को पार,

महिमा रामसेतु की कथा की,

जिसे बना दशहरा त्योहार!

हमने आज तक कई बार रामायण से जाना है कि, सीता का अपहरण करने पर श्री राम जी, रामसेतु पर चलकर समुद्र पार कर, श्रीलंका पहुंचे। और रावण का वध किया, जिसे हम दशहरे के रूप में मनाते हैं।

आज हम आपको रामसेतु के पुल के महत्व के बारे में बताएंगे। जहां राम का नाम लिखकर पत्थरों को पानी में फेंका गया लेकिन वो डूबे नहीं बल्कि पानी में तैरने लगे और इस प्रकार लंका तक पहुंचने के लिए समुद्र के ऊपर पुल का निर्माण संभव हुआ।

रामसेतु की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए इस पर विचार करना होगा कि भारत एवं श्री लंका के मध्य समुद्र में स्थित सम्पर्क मार्ग का नाम रामसेतु कैसे हुआ एवं इसका वैज्ञानिक पक्ष क्या है? इसके वैज्ञानिक पक्ष को जानने के लिए प्राचीनकालीन समुद्र की स्थिति, इसके मानव-निर्मित होने का प्रमाण, तत्कालीन सेतु – निर्माण – कला, सेतु की माप आदि का उत्तर है। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर ही इसकी प्रामाणिकता को सिद्ध करने की कोशिश कर रहे है।

राम सेतु ब्रिज हकीकत और आस्था :-

राम सेतु ब्रिज, नाम ही भारतीयों की आस्था से जुड़ा हुआ है। ऐसा कम ही होगा जिसने इस नाम के पीछे की कहानियाँ नहीं सुनी होंगी। यह नाम जितना हमारे धार्मिक इतिहास से जुड़ा हुआ है उतना ही महत्व आज के समय में इसकी सुंदरता और वैज्ञानिक खोजों से जुड़ा हुआ हराम सेतु का बोध वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में मिलता है जिसे वाल्मीकि रामायण भी कहते हैं। यह संस्कृत भाषा में लिखी गयी है। वहीँ राम चरित मानस को तुलसीदास के द्वारा लिखा गया है।

इन दोनों ही ग्रंथों में भिन्नताएं एवं समानताएं दोनों ही मौजूद हैं। इसके अलावा राम सीता से जुड़े ग्रंथो का मुख्य आधार वाल्मीकि रामायण ही है।साधारण शब्दों में कहें तो- रावण के द्वारा सीता जी के अपहरण के बाद राम, सीता जी की खोज में निकलते हैं। इस खोज में वह भारत के दक्षिण पूर्वी तट के किनारे आकर रुक जाते हैं। उनके सामने समुद्र होता है। जो सीता जी की खोज में बाधक साबित होता है।

सीता जी जहाँ कैद थी उस अशोक वाटिका(रावण के महल) तक पहुंचने के लिए समुन्द्र को पार करना आवश्यक था। सीता जी को देखने के लिए राम जी के द्वारा हनुमान को भेजा जाता है।

उन्हें उनकी शक्तियों का बोध कराया जाता है। इसके बाद हनुमान उड़कर समुद्र पार कर अशोक वाटिका में पहुंचते हैं और पूरी अशोक वाटिका में अपनी पूँछ से आग लगा देते हैं।हनुमान जी के लौटने के बाद समुद्र देव से रास्ता पार कराने के लिए अनुरोध किया जाता है। समुद्र देव के द्वारा उपाय दिया जाता है कि राम नाम लिख कर जो भी पत्थर समुद्र में गिराया जायेगा वह डूबेगा नहीं।

इसके पश्चात भगवान राम की सेना के दो वानर सैनिक नल-नील के द्वारा पुल बनाया जाता है, पत्थरों पर जय श्री राम नाम लिखा हुआ था, और वह तैर रहे थे। यही संक्षिप्त कहानी है जो हमने आज तक पड़ी है या सुनी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि नल तथा नील शायद जानते थे कि कौन सा पत्थर किस प्रकार रखने से पानी में डूबेगा नहीं और दूसरे पत्थरों को सहारा भी देगा। इसलिए उन्होंने‘प्यूमाइस स्टोन ’ का उपयोग किया होगा।

यह ऐसे पत्थर हैं जो ज्वालामुखी के लावा से उत्पन्न होते हैं। इन पत्थरों में कई सारे छिद्र होते हैं। छिद्रों की वजह से यह पत्थर एक स्पॉंजी यानी कि खंखरा आकार ले लेता है जिस कारण इनका वजन सामान्य पत्थरों से काफी कम होता है और पानी में डालने पर यह तैरता रहता है, लेकिन बाद में जब इन छिद्रों में पानी भर जाता है तो यह डूब जाते हैं, यह वजह है कि आज के समय में रामसेतु के पत्थर कुछ समय बाद समुद्र में डूब गए। खास बात यह है कि नासा ने सैटलाइट की मदद से रामसेतु पुल को खोज निकाला है।

राम सेतु को बनाने में वानर सेना को 5 दिन का समय लगा। इस पुल कि लम्बाई 48 किलोमीटर की है। यह भारत के दक्षिण पूर्व में रामेश्वरम स्थान और श्री लंका के पूर्वोत्तर में मन्नार की खाड़ी के बीच चूने और मूंगे से बनी उथली चट्टानों की श्रृंखला है। जिसे दुनिया में एडम्स ब्रिज के नाम से जानते हैं।

राम सेतु ब्रिज से सम्बंधित विवाद क्या था?

2005 में सरकार के द्वारा रामसेतु पुल को तोड़कर जहाजों के आने जाने के लिए रास्ता बनाने को मंजूरी दी गयी। आस्था का विषय होने के कारण इस ब्रिज को बनाने पर विवाद खड़ा हो गया। जिस वजह से इस प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया। इस प्रोजेक्ट के तहत 83 किलोमीटर लम्बे चैनल बनाने थे।

जिसकी वजह से 30 घंटे के सफर में कमी आती। अभी श्री लंका और भारत के बीच व्यापार के लिए जहाजों को लम्बा रास्ता अपनाना पड़ता है।

राम सेतु ब्रिज से जुड़े सभी वैज्ञानिक पहलू :

वैज्ञानिकों का मानना है कि जब कोरल और सिलिका पत्थर गर्म होता है तो वह अपने अंदर हवा भर लेता है जिसकी वजह से तैरने लगता है। एक दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि ज्वालामुखी की राख से निकले पत्थरों से यह पुल तैयार किया गया हो।

क्यों कि इन पत्थरों की संरचना भी तैरने में सहायक होती है।

किन्तु ऐसा है तो यह पत्थर यहां कैसे आये, ये भी एक प्रश्न है ?

रावण का वध कर श्रीलंका से लौटने के बाद भगवान राम ने रामसेतु को समुद्र में डुबो दिया था। ताकि कोई भी इसका दुरुपयोग ना कर सके। यह घटना युगों पहले की बताई जाती है। लेकिन कालांतर में बताया जाता है कि समद्र का जल स्तर घटता गया और सेतु फिर से ऊपर आता गया।

मगर वैज्ञानिकों के तथ्यो के आधार पर, 14 वीं शताब्दी में एक चक्रवात की वजह से राम सेतु ब्रिज टूट गया और यह समुद्री जलस्तर से 1-2 मीटर से नीचे चला गया। एवं यहां पानी का स्तर बढ़ गया।

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