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महाकाव्य प्रियप्रवास!!

Kavishala DailyKavishala Daily September 10, 2021
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दिवस का अवसान समीप था

गगन था कुछ लोहित हो चला

तरु-शिखा पर थी अब राजती

कमलिनी - कुल वल्लभ की प्रभा ॥१॥

-अयोध्याय सिंह उपाध्याय


प्रियप्रवास को आधुनिक काल का सबसे सफल माकाव्य माना गया है ,जिसकी रचन अयोध्याय सिंह उपाध्याय "हरिऔध" ने की है। इसका रचनाकाल 1909 से 1913 तक रहा है। बात करें इसकी काव्यवस्तु के आधार की तो वह श्रीमद्भागवत का दशम स्कंध है। इस पुरे काव्य में श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर उनके यौवन ,कृष्णा का ब्रज से मथुरा को प्रवास करना और लौट आना संछिप्त वर्णित है। यह एक तरह का विरहकाव्य है। इस महाकाव्य में कुल 17 सर्ग हैं जो मुख्यतः दो भागों में विभाजित है। पहले से आठवें सर्ग तक की कथा में कंस के निमंत्रण लेकर अक्रूर जी ब्रज में आते है तथा श्रीकृष्ण समस्त ब्रजवासियों को शोक में छोड़कर मथुरा चले जाते है। वहीं बात करें नौवें सर्ग से लेकर सत्रहवें सर्ग तक की तो, इन सर्गों में कृष्ण, अपने मित्र उद्धव को ब्रजवासियों को सांत्वना देने के लिए मथुरा भेजते है। बात करें भाषा की तो यह काव्य खड़ी बोली में लिखा गई है, खड़ी बोली में छोटे-छोटे कई काव्य-ग्रन्थ अब तक लिपिबध्द हुए हैं, परन्तु उनमें से अधिकांश सौ-दोसौ पद्यों में ही समाप्त हैं, जो कुछ बड़े हैं वे अनुवादित हैं मौलिक नहीं।


प्यारे जीवें जगहित करें ,गेह चाहे न आवें।


इस काव्य में कृष्ण प्रिय राधा का भी वर्णन है जिसमे दर्शाया गया है कैसे राधा अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से उपर उठकर मानवता के हित के लिए अपने प्रमी और प्रेम को समर्पित कर दिया ।


इस महाकाव्य में हरिऔध ने कृष्ण एवं राधा का भिन्न रूपों को चर्चित किया है। हरिऔध की प्रियप्रवास पर शिवदान सिंह चौहान कहते है कि

"प्रियप्रवास में कृष्ण अपने शुद्ध मानव रूप में विश्व कल्याण के काम में एक जन नेता के रूप में अंकित किए गए है"।


श्रीधर पाठक ने प्रियप्रवास के सम्बन्ध में लिखते हैं:-


दिवस के अवसान समे मिला।।

"प्रियप्रवास" अहो प्रिय आपका।।

अमित मोद हुआ चख कर चित्त को।।

सरस स्वाद -युता कविता नई ।।




दिवस का अवसान समीप था।

गगन था कुछ लोहित हो चला।

तरु-शिखा पर थी अब राजती।

कमलिनी-कुल-वल्लभ की प्रभा॥१॥


प्रियप्रवास षोडश सर्ग में श्रीकृष्ण के लोकसेवक रूप का चित्रण कुछ इस प्रकार किया गया है:


जो होता निरत तप में मुक्ति की कामना से।

आत्मार्थी है, न कह सकते हैं उसे आत्मत्यागी।


जी से प्यारा जगत-हित औ लोक-सेवा जिसे है।

प्यारी सच्चा अवनि-तल में आत्म त्यागी वही है।।


राधा जो श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेयसी है जन के कल्याण हेतु वह कृष्ण वियोग को स्वीकार कर लेती हैं। सामान्य मानव-जनित उद्गार प्रकट करने में भी वह संकोच नहीं करती। षोडश सर्ग में अपनी मनोव्यथा को बताते हुए वह कहतीं हैं :


मेरे प्यारे, पुरुष, पृथिवी-रत्न और शान्त-धी हैं।

सन्देशों में तदपि उनकी, वेदना व्यंजिता है।


मैं नारी हूँ, तरल-उर हूँ, प्यार से व्यंचिता हूँ।

जो होती हूँ विकल विमना, व्यस्त वैचित्र्य क्या है ?


प्रिय-प्रवास महाकाव्य का चित्रण भी अतुलनीय है। जहाँ प्रथम सर्ग से ही प्राणी-प्रकृति के अटूट संबंधों का चित्रण सपष्ट है , जहाँ ब्रजवासी प्रकृति के साथ सहज भाव से पले-बढ़े। ‘पवन-दूत‘ के माध्यम से राधिका का संदेश प्रकृति के साथ गहरे तादात्म्य का प्रमाण है। प्रकृति का आलम्बन, अलंकार एवं भाव-प्रकटीकरण की दृष्टि से सुन्दर निरूपण हुआ है। विषाद, शोक आदि भावों को प्रकृति-चित्रण के साथ प्रकटीकरण बहुत सुन्दर रूप में व्यक्त किया गया है, जैसे -समय था सुनसान निशीथ का,

अटल भूतल में तम राज्य था।


प्रलय काल समान प्रसुप्त हो,

प्रकृति - निश्चल नीरव शांत थी।।


श्रीकृष्ण के चरित्र को मानवीय रूप देकर लोकसेवा में तत्पर दिखाया है। इसके साथ स्थायी मानव-संबंधों का सम्यक विवेचन हृदय तत्त्व के साथ किया है, जहाँ माता-पिता, प्रेमी-प्रेमिका, सखा-सखी निरन्तर सुख-दुःख में साथ देते हैं और पथ की बाधा नहीं बनते,लोकसेवा को परम उद्देश्य मानते हुए सहभागी बनते हैं। आधुनिक मानव में मानवीय मूल्यों का संचार हों तथा स्वयं के लिए नहीं बल्कि लोक के लिए जीने की अमूल्य प्रेरणा है। श्रीकृष्ण का यह कथन इसी उद्देश्य को प्रकट करता है -


है आत्मा का न सुख किसको विश्व के मध्य प्यारा।

सारे प्राणी स-रूचि इसकी माधुरी में बँधे हैं।


जो होता है न वश इसके आत्म-उत्सर्ग द्वारा।

ऐ कान्ते हैं सफल अवनी-मध्य आना उसी का।


प्रिय-प्रवास महाकाव्य,कामंगला चरण के स्थान पर ‘प्रकृति-वर्णन‘ से काव्य का आरंभ है। नायक-नायिका आधुनिक मानव-मानवी हैं। काव्य-ग्रंथ का नाम ‘चरित्र प्रधान‘ न होकर ‘घटना-प्रधान‘ है। भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी है। भाषा में चित्रमयता व बिम्ब विधान आकर्षक है, यथा-दिवस का अवसान समीप था,

गगन था कुछ लोहित हो चला।


तरुशिखा पर थी अब राजती,

कमलिनी कुल बल्लभ की प्रभा।





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