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जनकवि नागार्जुन : "यात्री" की कविताओं का सफर

Kavishala DailyKavishala Daily November 6, 2021
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बाबा नागार्जुन हिंदी और मैथिली के प्रसिद्ध लेखक/कवि थे। उन्हें जनकवि नागार्जुन भी कहा जाता था। कुछ लोग उन्‍हें बाबा नागार्जुन भी बोलते थे। ज्यादातर वह इसी नाम से मशहूर थे। नागार्जुन एक कवि होने के साथ प्रगतिवादी विचारधारा के लेखक भी माने जाते थे। उन्होंने हिंदी में "नागार्जुन" नाम से तथा मैथिली में "यात्री" नाम से अपनी रचनाओं को लिखा था। 

जनकवि नागार्जुन का जन्म 30 जुन 1911 में हुआ था। यह बिहार राज्य के मधुबनी जिला के सतलाखा गांव के रहने वाले थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। 1936 में जब वह लंका के विद्यालंकार परिवेण में शिक्षा ले रहे थे। उस समय उन्होंने नागार्जुन नाम ग्रहण किया था। शुरू-शुरू में उनकी कुछ कविताएं यात्री नाम से ही छपी थी। लेकिन बाद में, उन्होंने अपनी रचनाएं नागार्जुन नाम से ही लिखना शुरू किया था। वह हिंदी, मैथिली, संस्कृत के अलावा बांग्ला भाषा के भी अच्छे जानकार थे। बांग्ला भाषा और साहित्य से उनका लगाव था। नागार्जुन को बहुत सारे पुरस्कार भी मिले हैं जैसे कि अकादमी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, शिखर सम्मान, साहित्य अकादमी इत्यादि। 5 नवंबर 1998 को, जनकवि बाबा नागार्जुन की मृत्यु हो गई। इस तरह एक हिंदी साहित्य के जनकवि का अंत हो गया।

प्रस्तुत है नागार्जुन जी की कुछ सुप्रसिद्ध कविताएं :-

(i) "गुलाबी चूड़ियां"

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ, 

सात साल की बच्ची का पिता तो है! 

सामने गियर से ऊपर 

हुक से लटका रक्खी हैं 

काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी 

बस की रफ़्तार के मुताबिक़ 

हिलती रहती हैं... 

झूककर मैंने पूछ लिया 

खा गया मानो झटका 

अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा 

आहिस्ते से बोला ׃ हाँ सा'ब 

लाख कहता हूँ, नहीं मानती है मुनिया 

टाँगे हुए है कई दिनों से 

अपनी अमानत 

यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने 

मैं भी सोचता हूँ 

क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ 

किस जुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से? 

और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा 

और मैंने एक नज़र उसे देखा 

छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में 

तरलता हावी थी सीधे-सादे प्रश्न पर 

और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर 

और मैंने झुककर कहा -

हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ 

वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे 

बर्ना ये किसको नहीं भाएँगी? 

नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

व्याख्या : इसमें कवि कहता है कि, बस की यात्रा के दौरान उसने गेयर के ऊपर हुक से लटकी कांच की चार गुलाबी रंग की चूड़ियां टंगी देखी तो, उसे रहा नहीं गया। तो ड्राइवर से पूछ लिया कि - यहां पर क्यों लटका रखी है गुलाबी चूड़ियां? तो वह बोला कि - मेरी 7 साल की बिटिया ने यहां टांग रखी है। अपनी याद के तौर पर। नहीं मानती है, बोलती है कि - अब्बा की नजरों के सामने रहेगी तो, मेरी याद रहेगी कवि बोला कि, जब उसकी बात में सुन रहा था तो उस ड्राइवर की आंखों में प्यार उमड़ पड़ा था, आंसू भर गए थे। तब मैंने कहा कि - भाई मैने तो यूं ही पूछ लिया था। किसको नहीं भाएँगी? नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!।

(ii) "तीनों बंदर बापू के"

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के! 

सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के! 

सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के! 

ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के! 

जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के! 

लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के! 

सर्वोदय के नटवरलाल 

फैला दुनिया भर में जाल 

अभी जिएँगे ये सौ साल 

ढाई घर घोड़े की चाल 

मत पूछो तुम इनका हाल 

सर्वोदय के नटवरलाल 

लंबी उमर मिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के 

दिल की कली खिली है, ख़ुश हैं तीनों बंदर बापू के 

बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के 

परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के 

सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

बापू को भी बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

बच्चे होंगे मालामाल 

ख़ूब गलेगी उनकी दाल 

औरों की टपकेगी राल 

इनकी मगर तनेगी पाल 

मत पूछो तुम इनका हाल 

सर्वोदय के नटवरलाल 

सेठों का हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

सत्य अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के 

मुस्काते हैं आँखें मीचे तीनों बंदर बापू के 

छील रहे गीता की खाल 

उपनिषदें हैं इनकी ढाल 

उधर सजे मोती के थाल 

इधर जमे सतजुगी दलाल 

मत पूछो तुम इनका हाल 

सर्वोदय के नटवरलाल 

मूँड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के 

करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के 

बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के 

गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के 

असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के 

दिल चटकीला, उजले बाल 

नाप चुके हैं गगन विशाल 

फूल गए हैं कैसे गाल 

मत पूछो तुम इनका हाल 

सर्वोदय के नटवरलाल 

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के 

गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बंदर बापू के 

सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के 

बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के!

व्याख्या : यहां पर कवि बापू के तीनों बंदरों के 100 साल पूरे हो जाने पर बोल रहे हैं कि - बापू के तीन बंदर बापू के भी ताऊ निकले। जीवनदानी, ज्ञानी-ध्यानी, लीला के गिरधारी, सर्वोदय के नटवरलाल, निकले हैं। दुनिया में इनका जाल फैल गया है। ढाई घर घोड़े की चाल चल रहे हैं। अभी, यह तो 100 साल और जिएंगे। यह परम चतुर है, अति सुजान है, सेठों का हित में दे रहे साथ हैं। युग पर प्रवचन लाद रहे हैं। गीता को छल रहे हैं। उपनिषद की ढाल बनी हुई है। दुनिया को मुंड रहे हैं। आसमान को चिढ़ा रहे हैं। बापू के यह तीनों बंदर, हमें अंगूठा दिखा रहे हैं। हिमाकत भी कर रहे हैं। प्रेमपगे, शहद सने है। तीनों बंदरों के भी गुरुओं के भी गुरू बने हैं। यह गांधी के तीन बंदर सौवीं बरसी बना रहे हैं। बापू के यह तीन बंदर।

(iii) "अकाल और उसके बाद"

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास 

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास 

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त 

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त 

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद 

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद 

चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद 

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद

व्याख्या : इसमें कवि कहता है कि - अकाल पड़ने से घर में चूल्हा नहीं जला। चक्की भी नहीं चली। घर की दीवारों पर छिपकली गश्त लगाने लगी। चूहों की भी हालत खराब रही। आज कई दिनों बाद घर में दाने आए हैं। आंगन से कई दिनों बाद धुआं उठ रहा है। घर भर के सभी लोगों की आंखें चमक गई है। कई दिनों के बाद आज कुछ खाने को मिलेगा।


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