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ओड़िया भाषा के प्रख्यात साहित्यकार गोदावरीश मिश्र

Kavishala DailyKavishala Daily October 29, 2021
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साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत ओड़िया भाषा के प्रसिद्ध साहित्यका गोदावरीश मिश्र का जन्म आज ही के दिन १८१६ को पुरी, उड़ीसा में एक ब्राह्मण के घर हुआ था। प्रख्यात लेखक होने के साथ-साथ गोदावरीश मिश्र एक समाज सुधारक एवं कार्यकर्ता भी थे। उन्होंने विविध विधाओं में कविता, नाटक, उपन्यास, कहानियाँ तथा जीवन चरित्र आदि लिखे हैं। इसके साथ-साथ उन्होंने 1941 में उड़ीशा के शिक्षामंत्री और वित्तमंत्री का पद भी सम्भाला था।


समाजवादी सोच रखते थे गोदाबरीश मिश्र:


मिश्र जी ने हमेशा से समाज की विसंगतियों और बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई। समाज सेवा की भावना गोदावरीश मिश्र के अन्दर आरंभ से ही थी। समाज में पैर जमा चुकी बहुत-सी रूढ़ियों का पालन न करने के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ा जिसकी भी उन्होंने कोई परवाह नहीं की। वे एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार से थे लेकिन वे समाजवादी थे। उनके विचार अलग थे ,उन्होंने जाति और पंथ को स्वीकार नहीं किया। एक ब्राह्मण होते हुए उन्होंने ब्राह्मणो द्वारा धारण किया जाने वाला अपना पवित्र धागा उतार दिया और मूंछें भी रखने लगे जो ब्राह्मण जाति के विरूद्ध थी।


जब डिप्टी कलेक्टर की नौकरी को किया अष्विकार :


उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें अपने आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैण्ड और अमेरिका जाने का अवसर मिला पर उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। अपने देश के प्रति उनके भाव का पता इसी से लगाया जा सकता है कि जब भारत की ब्रिटिश सरकार उन्हें डिप्टी कलेक्टर की नौकरी दे रही थी तब उस नौकरी को अष्विकार कर उन्होंने उसके स्थान पर पं. गोपबन्धु द्वारा स्थापित ‘सत्यवादी स्कूल’ में 30 रुपये प्रतिमाह वेतन पर अध्यापक बनना स्वीकार किया। राष्ट्रीय नवजागरण के क्षेत्र में भी गोदावरीश मिश्र की लेखनी का बड़ा योगदान रहा।

महात्मा गांधी और राजनितिक जीवन :


महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित मिश्र जी महात्मा गांधी के कार्य को आगे बढ़ाने में अपना अहम् योगदान देते थे। १९२९ में जब गांधी ओडिसा भ्रमण यात्रा के लिए ओड़िशा आए थे तब गोदावरीश मिश्र ने उन्हें २ दिन के लिए अपने घर पर रोक लिया था।बात करें मिश्र जी के राजनितिक जीवन की तो १९२४ से १९३३ तक वे जिला बोर्ड के सदस्य रहे। जिसके बाद उन्होंने ५ वर्ष का विराम लिया और १९३७ से ओडिशा विधानसभा के सदस्य रहे। इस समय के दौरान उन्होंने राजनीतिक मतभेदों के कारण उड़ीसा कांग्रेस में कोई पद नहीं संभाला। जब कांग्रेस का उड़ीसा मंत्रालय बनाया गया तो उन्हें मंत्रालय में शामिल नहीं किया गया था। जिसके बात १९५२ में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में विधानसभा सदस्य बने। उन्होंने विधानसभा में एक प्रतिष्ठित प्रशासक और विरोधी दल के सदस्य के रूप में कार्य किया हांलाकि १९३९ में कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने १९४१ से १९४४ तक परलखेमंडी के महाराजा मंत्रालय में वित्त और शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया। और साथ ही उन्होंने उत्थान विश्वविद्यालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


उनकी कविताओं ने राष्ट्र के प्रति जागरूकता पैदा करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका लिखा नाटक 'पुरुषोत्तम देब', 'मुकुंद देब', 'अर्ध शताब्दी रा ओड़िशा ओ तहिन रे मो स्थान'ओड़िशा साहित्य के लिए एक अमर उपहार है।वे एक कुशल संपादक भी थे। 1924 में उन्होंने बानापुर से "लोकमुख" पत्रिका प्रकाशित की इसके साथ वे 'समाज' के संपादक भी थे और शशिभूषण रथ द्वारा प्रकाशित "ईस्टकोस्ट" के लिए भी लिखते थे। साहित्य में दिया उनका योगदान आज भी अमर है। 

वे एक उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ, पंडित, शिक्षक, इतिहासकार, कवि, लेखक, संपादक और वक्ता थे।



 



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